रविवारीय- काम और ज़िंदगी के बीच संतुलन, आख़िर हम 24×7 अलर्ट मोड पर क्यों हैं ?

संतुलन साधने की क़वायद

घुमक्कड़ हूँ मैं। घुमक्कड़ी मेरा शौक है। हाँ! घुमक्कड़ प्रजाति का फ़िलहाल नहीं हूँ, पर भविष्य के बारे में कुछ नहीं कह सकता।
कल को जो चीज़ें वर्ण-व्यवस्था से शुरू हुई थीं, वे कालांतर में

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

समुदायों से आगे बढ़ती हुई छोटी-बड़ी जातियों में तब्दील हो गईं। सेपियन्स काल के शुरुआती दौर में जातियाँ नहीं होती थीं। लोग समूहों में रहा करते थे। परिवार, समाज, शादी-विवाह जैसी किसी भी प्रकार की संस्थाएँ तब अस्तित्व में नहीं थीं। बच्चे जन्म लेते थे, लेकिन बच्चे का बाप कौन है, यह किसी को पता नहीं होता था। हाँ, वह बच्चा पूरे समूह का प्यार ज़रूर पाता था। हर व्यक्ति उसे अपना बच्चा समझता था।
धीरे-धीरे तमाम तरह की संस्थाएँ अस्तित्व में आईं। वर्ण-व्यवस्था हौले-हौले जातियों में तब्दील होती गई। अब तो हम इतनी सारी जातियों, उपजातियों और समुदायों में बँटे हुए हैं कि अगर हम जैसे घुमक्कड़ों की भी कालांतर में कोई अलग जाति बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हमारे सामने ऐसे उदाहरण भी हैं, जब कोई समुदाय धीरे-धीरे एक जाति में तब्दील हो गया।
खैर! लगता है, हम फिर से भटक गए हैं। भटकने की हमारी पुरानी आदत जो हो गई है। पर क्या करें? लोगों को मनु शायद इसी वजह से पसंद भी है। मनु यूँ ही भटकता रहे और अपने अनुभव साझा करता रहे।
आइए कुछ और बातें करते हैं । थोड़ा ज़िंदगी जीने की कोशिश करते हैं । इंडिया से बाहर बहुत ज़्यादा जगह तो मैं नहीं घूम पाया हूँ, लेकिन दो-चार अति-विकसित देशों में घूमने का मौका ज़रूर मिला है।
मैं ठहरा बलागर। मुझे लोगों से बातें करना, उनके साथ समय बिताना अच्छा लगता है। आप इसे अपनी पसंद के अनुसार बकैती कह लें या फिर बतकही। अगर मैं लोगों से बातें न करूँ, उनके विचारों, उनकी बातों और उनकी भावनाओं को न सुनूँ, तो शायद मेरे शब्द अपनी मौलिकता खो देंगे।
लोगों से मिलने-जुलने के इसी क्रम में मुझे वहाँ की संस्कृति, सभ्यता और ख़ासकर उनकी कार्य-संस्कृति के बारे में जानने का मौका मिलता है। मैं यह जानना चाहता था कि हमारी कार्य-संस्कृति से उनकी कार्य-संस्कृति किस तरह अलग है। वे अपने करियर की माँगों और व्यक्तिगत ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियों के बीच किस तरह संतुलन बैठाते हैं।
कार्य संस्कृति और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारियों के बीच संतुलन को लेकर, बातचीत के दौरान लगभग सभी लोगों ने एक ही बात कही—हाँ, कहने का उनका अंदाज़ ज़रूर अलग-अलग था। मतलब यह कि वहाँ की कार्य-संस्कृति ही कुछ ऐसी है कि उन्हें अपने करियर की माँगों, व्यक्तिगत ज़िंदगी की अपेक्षाओं और परिवार की ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में बहुत ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती।
तभी तो वे अपने प्रोफ़ेशनल करियर के साथ-साथ परिवार, अपनी हॉबीज़, व्यक्तिगत जीवन और पारिवारिक वेल-बिइंग के लिए भी बखूबी समय निकाल लेते हैं।
वहाँ साप्ताहिक अवकाश के दिनों में, या फिर अन्य किसी छुट्टी के दौरान, घर और दफ़्तर के बीच जैसे एक दीवार-सी खड़ी हो जाती है—कुछेक अपवादों को छोड़कर। अपवाद तो खैर, हर जगह होते हैं। वहाँ एक अलिखित-सा नियम होता है कि अवकाश के दिनों में कार्यालय और कर्मचारी के बीच संवादहीनता की स्थिति बनी रहे। किसी भी तरह के औपचारिक या अनौपचारिक संदेश का आदान-प्रदान आमतौर पर नहीं होता।
सभी के अपने-अपने दायरे होते हैं और कोई भी आमतौर पर दूसरे के दायरे का अतिक्रमण नहीं करता। आप हों या आपके बॉस, सभी शिद्दत के साथ इस बात का ध्यान रखते हैं।
उनकी प्रोफ़ेशनल ज़िंदगी और व्यक्तिगत ज़िंदगी की ब्लेंडिंग इतनी स्मूथ होती है कि इस बारे में उन्हें ज़्यादा सोचने-विचारने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। शुक्रवार की दोपहर बाद से ही लोग अवकाश मोड में आ जाते हैं। तभी तो हैपीनेस इंडेक्स के पैमाने पर उनकी ख़ुशी का स्तर हमसे कहीं ज़्यादा बढ़ा हुआ होता है ।
स्विट्ज़रलैंड में मैंने पाया कि वहाँ रात के दस बजे से सुबह छह बजे के बीच अगर आपकी वॉशिंग मशीन या यहाँ तक कि टॉयलेट के फ्लश की आवाज़ से भी किसी को परेशानी होती है, तो आप यह मानकर चलें कि वह सीधे पुलिस का दरवाज़ा खटखटा सकता है। साप्ताहिक अवकाश का तो कहना ही क्या! आमतौर पर रिहायशी इलाक़ों में पिन-ड्रॉप साइलेंस जैसा माहौल रहता है।
इन बातों की तुलना जब हम अपने यहाँ से करते हैं तो वाक़ई लगता है कि हम 24×7×365 अलर्ट मोड पर रहते हैं।
सोशल मीडिया की हम जितनी खिंचाई कर लें, लेकिन यहाँ पर किसी भी वक़्त आए किसी भी औपचारिक या अनौपचारिक संदेश की अनदेखी हम आसानी से नहीं कर पाते। छुट्टी का दिन हो या देर रात का समय—कोई भी एक संदेश हमारी व्यक्तिगत ज़िंदगी की चौखट लाँघकर अंदर आ ही जाता है। और मज़े की बात यह है कि कई बार हम खुद ही उस दरवाज़े को खुला रखते हैं।
आस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान हमारे साथ एक घटना घट गई। हमारी कार का किसी ने विंडो ग्लास तोड़कर हमारा बैग निकाल लिया। बैग में हमारे पासपोर्ट, क्रेडिट कार्ड और कुछ करेंसी थी। सामान तो खैर नहीं मिला, लेकिन जब हमने थाने में शिकायत दर्ज करवाने की कोशिश की तो वहाँ से हमें बताया गया कि आप फोन पर ही शिकायत दर्ज करवा दीजिए। यहाँ आने का कोई फ़ायदा नहीं है, क्योंकि आज रविवार है और हमारे यहाँ थाने में अवकाश के दिनों में कोई मौजूद नहीं होता।
हमने तब अपनी शिकायत ऑनलाइन ही दर्ज करवाई और उसकी पावती, पूरे विवरण के साथ, हमें तत्काल मिल गई।
इस पूरी घटना ने भी मुझे एक बार फिर सोचने पर मजबूर किया—काम और जीवन के बीच की वह दूरी, जिसे हम अक्सर अपने यहाँ मिटा देने को तत्पर रहते हैं, क्या वाक़ई मिटा देनी चाहिए?
शायद काम ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा है, लेकिन पूरी ज़िंदगी नहीं। और शायद घुमक्कड़ी का असली मज़ा भी तभी है, जब आदमी दफ़्तर से बाहर निकलकर दुनिया को सिर्फ़ देखे नहीं, उसे सुने, समझे और महसूस भी करे।
आख़िर मैं ठहरा घुमक्कड़। थोड़ा भटकूँगा, थोड़ा बतियाऊँगा और फिर लौटकर अपनी तरह से कहूँगा—मनु कहिन।
🖋️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘

Leave a Reply