व्हाट्सएप की दुनिया
बात थोड़ी पुरानी ज़रूर है, पर उतनी भी पुरानी नहीं कि उसे हम बता न सकें । यह उन दिनों की बात है , जब हम दांत के रोग से नये नये पीड़ित हुए थे । जब दांत का दर्द सताता था तब समझ में

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
नहीं आता था कि क्या किया जाए । मेरे मित्रगण में कुछ लोग दांतों के डॉक्टर हुआ करते थे । अपने इलाज के लिए हम शाम में उनके क्लिनिक पहुंचते थे । इलाज के बहाने उनसे मुलाक़ात भी हो जाती थी और मेरी समस्या भी दूर हो जाती थी । किसी कारणों से उस वक़्त हमारी दुनिया बैचलरों की तरह थी । समय की कोई कमी नहीं थी । उस वक्त हमें कहाँ मालूम था कि दांतों के डॉक्टर के पास जाना मतलब उनसे रिश्ता बनाने जैसा था ।
ख़ैर ! इसी बहाने देर शाम क्या कहें देर रात तक की बैठकी वहीं जमती थी । डॉ साहब अपने काम में लगे रहते थे और हम सभी अपने काम में मशगूल । बातचीत की कोई सीमा नहीं थी । देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक की तमाम चर्चाएँ वहाँ होती थीं ।
उस वक़्त व्हाट्सएप नया नया आया था । मुझे इस व्हाट्सएप नाम के बला के बारे में थोड़ा भी इल्म नहीं था । अपनी दुनिया बिल्कुल अलग थी इनसे । हमारे पास उस वक़्त स्मार्टफ़ोन भी नहीं हुआ करता था । बैठकी में उस वक़्त उन सभी की चर्चाओं का केंद्र बिंदु, उन सभी के बीच आपस में व्हाट्सएप चैट पर सूचनाओं का आदान प्रदान का होना था और इसी के मुतलिक अधिकांश बातें हुआ करती थीं । मनु के पल्ले कुछ पड़ता नहीं था । हम बिल्कुल बतख़ की मानिंद उन सभी की बातें सुनते रहते थे । तब वाक़ई मुझे इस बला के बारे में जानकारी नहीं थी । हालाँकि उनकी दुनिया भी व्हाट्सएप के बारे में बहुत कुछ नहीं जानती थी । कहाँ से जानती ? नया नया तो आया था अभी । बस सभी इधर का माल उधर और उधर का माल इधर करने की जुगत में लगे रहते थे । किस के पास सूचना पहले आई और किसने सबसे पहले उसे एक दूसरे से साझा किया बस सभी इसी syndrome से ग्रस्त थे । कौन पहले व्हाट्सएप पर सूचनाओं का आदान प्रदान करेगा, उनकी दुनिया वहीं तक सीमित थी । मौलिकता तो कहीं थी ही नहीं । शायद अधिकांश के पास आज भी नहीं है । सभी सुबह से शाम तक बस इधर का माल उधर और उधर का माल इधर करने की क़वायद में भी लगे रहते हैं ।आज भी जब लोगबाग ज़्यादा ज्ञान बघार रहे होते हैं तो व्यंग्यात्मक लहज़े में उन्हें कहा जाता है – कहीं आपने इसे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से तो नहीं हासिल किया है ।
खैर ! समय के साथ-साथ स्मार्टफ़ोन आम होता गया और क्या आम और क्या ख़ास सभी के लिए सुलभ होता गया । आज तो हालात यह है कि इसने कहाँ कहाँ अपनी पहुँच बना रखी है आपको पता भी नहीं है ।
रही सही कसर जियो ने पूरी कर दी । जियो डिजिटल लाइफ के तहत शुरुआती महीनों में मुफ्त डेटा की सुविधा दी गई थी । इस आफर के ख़त्म होने के बाद भी “ Jio Dhan Dhana Dhan “ के तहत ग्राहकों को बेहद सस्ते दाम पर डेटा की सुविधा उपलब्ध करवाई गई थी, तब लोगों को यह कहाँ पता था कि एक दिन यह ‘ अफ़ीम ‘ का नशा छुटाए न छुटेगा । ग़ुलाम बना दिए जाएँगे सभी । पुरी दुनिया इसकी गिरफ़्त में होगी । आपकी प्राइवेसी ख़त्म हो जाएगी । आपकी दिनचर्या, आपकी आदतें, आपकी पसंद-नापसंद—सब कुछ व्हाट्सएप की दुनिया का हिस्सा बन जाएगा।
आज लोगों को समझ में आ रहा है । उन्हें दिख भी रहा है और अहसास भी हो रहा है । पर इससे छुटकारा पाना इतना आसान भी नहीं है । क्या आम क्या ख़ास सभी इसके ग़ुलाम बने हुए हैं । इससे बचने का तरीक़ा ढूँढ रहे हैं, पर यह ऐसा है जो एक बार लोगों के मन मस्तिष्क पर चढ़ जाए तो बड़ी मुश्किल से उतरता है । वस्तुतः इसने तो आपके मन मस्तिष्क को क़ाबू में कर लिया है । पहले हमें लगता था कि हम इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, पर अब तो लगने लगा है कि हम नहीं बल्कि व्हाट्सएप ही हमारा इस्तेमाल कर रहा है और हम बँधुआ मज़दूर की तरह इससे बाहर निकलने को छटपटा रहे हैं । चाह कर भी निकल पाना मुश्किल हो रहा है ।
कभी हमारे सुविधा के लिए, हमें सबसे कनेक्ट करने के लिए इस्तेमाल किया गया टूल- व्हाट्सएप ! आज हमारी बेड़ी बन कर रह गया है । चौबीसों घंटे जैसे कान में नोटिफिकेशन की आवाज़ गूँजती रहती है । नींद में भी ध्यान नोटिफिकेशन पर ही लगा रहता है । कहीं कुछ मिस न कर जाए । एक अजीब सा डर घर और बाहर दोनों ही जगह पर लगा रहता है । एक अजीब से FOMO ने ग्रसित कर लिया है हमें । पता नहीं कब क्या हो जाए ।
और मज़े की बात यह है कि हम जानते हैं कि हम इसके आदी हो चुके हैं। हमें यह भी पता है कि यह हमारी निजता, हमारे समय और हमारे सुकून का कितना हिस्सा अपने साथ ले जा रहा है। फिर भी इससे दूर नहीं हो पाते।
कभी जो हमारे लिए दुनिया से जुड़ने का एक दूसरे के क़रीब आने का माध्यम था, वही आज हमें अपनी ही दुनिया से काटने लगा है। हमने अपने पसंदीदा लोगों को लेकर एक व्हाट्सएप ग्रुप तो बना रखा है, पर कहीं न कहीं यही व्हाट्सएप ग्रुप वजह भी बन रहा है संवादहीनता । पहले हम वजह बेवजह लोगों से या तो रुबरु मिल लिया करते थे या टेलीफ़ोन पर बातें कर लिया करते थे । अब तो अहम मौकों पर भी व्हाट्सएप ग्रुप पर एक संदेश छोड़ दिया और हो गयी अपने कर्तव्यों की ख़ानापूर्ति । वर्षों बीत जाते हैं अपने क़रीबियों से रुबरु होने में । हालाँकि संदेशों का आदान प्रदान तो लगभग रोज़ ही होता है । अब तो लोग अपने क़रीबियों का अंतिम संस्कार/ दर्शन भी आभासी माध्यम से ही करने लगे हैं ।
खैर ! बदलती हुई दुनिया है । बदलते हुए लोग हैं । हां, पर लौट कर सब कुछ यहीं आता है । यही तो प्रकृति का नियम है । पता नहीं इनसे कब निजात मिलेगी, या फिर मिलेगी भी या नहीं।
मनीष वर्मा “मनु”
