कायस्थों का गढ़ रहा है पटनासाहिब लोकसभा सीट

पटना, बिहार की हाईप्रोफाइल सीट में शामिल पटना/ पटनासाहिब सीट कायस्थों का गढ़ रहा है। यहां कायस्थ मतदाता तय करते हैं कि पटना का सांसद कौन होगा। बिहार की राजधानी पटना का पुराना नाम पाटलिपुत्र था। पवित्र गंगा नदी के दक्षिणी तट पर बसे इस शहर को लगभग 2000 वर्ष पूर्व पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1952 के पहले आम चुनाव में पाटलिपुत्र संसदीय सीट हुआ करती थी। इसके बाद पाटलिपुत्र सीट विलोपित हो गया और वर्ष 1957 में पटना लोकसभा सीट अस्तित्व में आई। आपातकाल के…

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रविवारीय में आज पढ़िए, बाजारवाद का उत्कृष्ट उदाहरण- ब्रांड वैल्यू

चलिए आज़ रविवारीय चिन्तन में हम अर्थ पर चिन्तन करते हैं। कुछ मनन करते हैं, कुछ जानने की कोशिश करते हैं बाजार और उससे उभर कर सामने आया बाजारवाद के बारे में। हम यहां आपको अर्थशास्त्र की जटिलताओं के बारे में आपसे बातें नहीं कर रहे हैं। यह हमारा विषय भी नहीं है। हम तो एक आदमी के नजरिए से आपके समक्ष अपनी बातों को रखते हुए थोड़ा अर्थशास्त्री बनने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, इसे आपने भी देखा होगा, महसूस जरूर किया होगा, पर आज़ हम आपके मुखातिब…

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क्यों संदिग्ध है अकादमी पुरस्कारों की वार्षिक गतिविधियां ?

आखिर क्यों सही से काम नहीं कर पा रही साहित्य अकादमियां? पिछले दशकों में पुरस्कारों की बंदर बांट कथित साहित्यकारों, कलाकारों और अपने लोगों को प्रस्तुत करने के लिए विशेष साहित्यकार, पुरोधा कलाकार, साहित्य ऋषि जैसी कई श्रेणियां बनी है। जिसके तहत विभिन्न अकादमियां एक दूसरे के अध्यक्षों को पुरस्कृत कर रही है और निर्णायकों को भी सम्मान दिलवा रही है। इन पुरस्कारों में पारदर्शिता का अभाव है। राज्य अकादमी पुरस्कारों की वार्षिक गतिविधियां संदिग्ध है। जो कार्य एक वर्ष में पूर्ण होने चाहिए उनको करने में सालों लग रहें…

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वोटर लिस्ट में बढ़ती महिलाएं संसद में कब बढ़ेगी?

महिलाओं का वोट 48%, फिर सीटें 14% ही क्‍यों? भारत की महिला मतदाता; एक ताकत है जिसे गिना जाना चाहिए। राजनीतिक दल कल्याणकारी योजनाओं और रियायतों के वादों के साथ महिलाओं के वोट हासिल करने की होड़ में हैं, लेकिन सच्चा सशक्तिकरण अभी भी मायावी है। जब तक राजनीतिक पार्टियां अधिक से अधिक महिलाओं को टिकट नहीं देती, तब तक उनकी भागीदारी बढ़ाने की कल्पना तक नहीं की जा सकती। देश की मतदाता सूची में महिला वोटरों की तादाद लगातार बढ़ रही है। लेकिन राजनीतिक दलों की ओर से टिकट…

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राजनीतिक हस्तक्षेप से त्रस्त शिक्षा संस्थान

विश्वविद्यालय शैक्षणिक सुधारों के बजाय राजनीतिक हितों के पोषण का केंद्र न बनने पाएं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति केंद्र सरकार और राज्यों के विश्वविद्यालयों में राज्य सरकारें करती हैं। जिस राज्य में जिस पार्टी की सरकार होती है, वह अपने चहेतों को कुलपति नियुक्त करती है। हर राज्य में इस तरह के उदाहरण हैं। यदि कुलपति की नियुक्ति इस आधार पर होगी कि वह सत्तारूढ़ दल या उसके मुखिया का कितना करीबी है तो क्या उससे शैक्षणिक सुधार लाने की उम्मीद बेमानी नहीं होगी? कहने की जरूरत नहीं…

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