रविवारीय- बैरंग पत्र और तार- पुरानी चिट्ठियों में छुपी यादों का संसार

बैरंग पत्र पुरानी यादें भी कहाँ पीछा छोड़ती हैं।न चाहते हुए भी गाहे – बगाहे आपके सामने आकर खड़ी हो…

रविवारीय- सोन पापड़ी में लिपटा बचपन- एक मिठाई, ढेरों यादें और लौटता हुआ बचपन

बचपन की अपनी मिठाई सोन पापड़ी कब सोहन पापड़ी हो गई, पता ही नहीं चला। हालाँकि, कहीं इसे सोन पापड़ी…

रविवारीय- आज जाने की ज़िद न करो, जब भागदौड़ भरी ज़िंदगी सुकून और ‘मूड वाली छुट्टी’ माँगने लगे

“आज जाने की ज़िद ना करो । यूँ ही पहलू में बैठे रहो ॥” फ़ैयाज़ हाशमी द्वारा लिखी गई एक…

रविवारीय- जब व्हाट्सएप हमारा ज़रिया नहीं, हमारी दुनिया बन गया

व्हाट्सएप की दुनिया बात थोड़ी पुरानी ज़रूर है, पर उतनी भी पुरानी नहीं कि उसे हम बता न सकें ।…