रविवारीय- बाबुओं का ‘माल रोड’, लंच ब्रेक की चहलकदमी, सुकून और दफ़्तर की अनकही दुनिया

चलिए आज आपको हम बाबूओं के ‘ माल रोड ‘ का दर्शन कराते हैं । क्यों ? चौंक गए न…

नीट के बवाल के बीच एक बड़ा सवाल: डॉक्टर बनने की राह में संवेदनाएँ कहाँ खो जाती हैं?

– डॉ. सत्यवान सौरभ देश में जब भी नीट (NEET) परीक्षा होती है, उसके बाद केवल परिणामों की नहीं, बल्कि…

डिजिटल पत्रकारिता में बढ़े जवाबदेही के मानक, मान्यता प्राप्त सेल्फ रेगुलेटरी बॉडी (SRB) से संबद्धता बने अनिवार्य

पूर्णेन्दु पुष्पेश, महासचिव, वेब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, झारखंड लोकतंत्र का चौथा स्तंभ केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज…

रविवारीय- वैभव और विवशता के बीच का द्वंद्व

किसी काम से दिल्ली आना हुआ। काम क्या था—एक पारिवारिक समारोह में शामिल होना था। नौकरीपेशा लोगों के लिए कार्यालयी…

रेलवे स्टेशनों के बुक स्टॉलों पर पसरा सन्नाटा: क्या इंटरनेट युग ने छीन ली पढ़ने की संस्कृति?

डॉ. सत्यवान सौरभ भारतीय रेलवे स्टेशन केवल यात्रियों के आवागमन के केंद्र नहीं रहे हैं, बल्कि वे लंबे समय तक…

रविवारीय- ज़िंदगी की ट्रेन आउटर सिग्नल पर, हर पल को जी लेने का संदेश

अपना और अपने बच्चों का जन्मदिन, पत्नी के साथ शादी और शादी की सालगिरह के सुनहरे पलों को जीते हुए…