रविवारीय- आस्था, विश्वास, अंधभक्ति या प्रशासनिक नाकामयाबी कुछ भी कह लें, पर जानें तो चली गईं

हाल के दिनों में दो घटनाएं हुई। दोनों ही घटनाएं हृदयविदारक थीं। एक घटना में उत्तर प्रदेश के हाथरस के पास एक गांव में सत्संग के दौरान अत्यधिक भीड़ की वज़ह से कुचल कर लगभग 120 लोगों की जान चली गई। वो हाथरस जिसे हम जैसे कई लोग सुप्रसिद्ध हास्य व्यंग्य के कवि काका हाथरसी के नाम से जानते हैं। वो काका हाथरसी जिन्होंने अपने मित्रों को कहा था कि उनके मरने के बाद उनकी अंतिम यात्रा में कोई शोक नहीं मनाएगा। हंसते और खिल-खिलाते हुए लोग उनकी अंतिम यात्रा में आएंगे। और ऐसा

मनीश वर्मा,लेखक और विचारक

ही हुआ था।
खैर! आस्था, विश्वास, अंधभक्ति या प्रशासनिक नाकामयाबी कुछ भी कह लें। जानें तो चली गईं। मरने वालों में महिलाओं और बच्चों की संख्या ज़्यादा थी। अधिकतर गरीब तबके के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोग थे। अपनी अपनी परेशानियों को लेकर बाबा के पास उसके निराकरण के लिए आए थे। भोले भाले लोगों को उस तथाकथित बाबा भोले में भगवान् दिखता था।
आज़ हम उस घटना की पोस्टमार्टम करने बैठे हैं। परतें दर परतें बखिया उधेड़ी जा रही हैं। बाबा भोले के जन्म से लेकर अब तक की कुंडली खंगाली जा रही है। रोम कोई एक दिन में नहीं बना था। इसी तरह इस बाबा भोले की जो तथाकथित बुलंद इमारत बनी है उसमें हम सभी का योगदान है। हम सबने मिलकर बनाया है इन्हें। एक ईंट हमारी भी लगी हुई है। आज़ हम किस मुंह से कह सकते हैं कि हम निर्दोष हैं। वज़ह चाहे कुछ भी रही हो। क्या उनकी शुरुआत और उनके कारनामे किसी से छुपे हुए थे ? बिल्कुल नहीं! आम आदमी तो बिल्कुल भोला भाला होता है। उसकी शुरुआत दाल रोटी की जद्दोजहद से होती है और वो बिचारा इस जद्दोजहद से शायद मरने के बाद ही निजात पाता है, और ऐसे लोग बड़ी आसानी से इस तरह के बाबाओं के शिकार हो जाते हैं। ऐसा नहीं लगता है आपको कि ये जो आम लोग हैं उन्हें शिकारे की तरह शिकारी ने जंगल में बड़े जानवर के भोजन के लिए छोड़ दिया है। जो व्यक्ति खुद को नहीं संभाल पाया। दुनिया से लड़ नहीं पाया। उसने बड़ा ही आसान रास्ता चुना लोगों को बेवकूफ बना अपना उल्लू सीधा करते हुए पैसा कमाने का। एक उद्योग की तरह फल फूल रहा है यह कारोबार। यहां हर कोई अपने अपने हितों को साधने में लगा हुआ है। पता नहीं, हम किस रास्ते पर चल पड़े हैं। इतने सम्मोहित हो चुकें हैं या कह लें कर दिए गए हैं कि हमारा विवेक, हमारी तार्किकता कहीं खो सी गई है।
अब आते हैं दूसरी घटना पर। लखनऊ शहर के चौक क्षेत्र में एक तरफा प्रेम में पागल एक प्रेमी ने लड़की और उसके भाई पर तेजाब फेंक दिया। पता नहीं इन्हें इतनी आसानी से तेजाब मिल कैसे जाता है जबकि यह प्रतिबंधित है।
बड़े ही अफसोस की बात है, यह घटना उसे शहर में होती है जो शहर अपनी नफासत नज़ाकत और तहज़ीब के लिए पुरी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान रखता है। शहर के एक हिस्से में इस तरह की घटना घटती है और इसी शहर के दूसरे बिल्कुल विपरीत हिस्से में तेजाब पीड़ित व्यक्तियों के द्वारा एक कैफ़े चलाया जाता है जिसका नाम शीरोज है।
इन्हें समाज के मुख्यधारा में शामिल करने के लिए एक फाउंडेशन के द्वारा यह कैफ़े चलाया जाता है। जब आप यहां पर आएंगे तब आप पाएंगे यहां के किचन से लेकर व्यवस्था तक की सारी जिम्मेदारी तेजाब पीड़ितों के हाथों में ही है। समाज के मुख्य धारा में इन्हें देखकर एक अच्छा अहसास होता है। यह आपसे अपने बारे में खुलकर बातें करते हैं । अपने साथ हुई घटना के बारे में भी बात करते हैं। इनकी बातों से एक निष्कर्ष तो निकलता है इस तरह की घटनाओं के मूल में दुश्मनी कम बल्कि एक तरफा प्रेम का मामला ज्यादा है। हाल में एक फिल्म आई थी ‘ छपाक ‘ । हालांकि, फिल्म में तो किरदार किसी और ने निभाया था, पर यह एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म थी और जिस पीड़िता पर वो फिल्म बेस्ड थी वो इसी कैफ़े में काम करती हैं।एक बात जो रह रह कर मुझे टीस रही है; भीड़भाड़ के बीच दिन दहाड़े इस तरह की घटना घट जाती है और अपराधी बड़े आराम से भाग जाता है। कोई उसे रोकने में आगे नहीं आता है। जिस सामाजिक ताने-बाने की हम दुहाई दिया करते थे वो छिन्न-भिन्न हो गया है। सोचने वाली बात है। आज़ भी जिस जगह पर सामाजिक रूप में हम मजबूत हैं वहां अपराध नहीं के बराबर है।
एकतरफा प्रेम में पागलपन एक मनोविकृति है। इस तरह का इंसान अपने साथ ही साथ किसी को भी हानि पहुंचा सकता है । ऐसे लोगों से अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है, और इन्हें अपनी गलतियों का कोई पछतावा भी नहीं होता है। थोड़े गंभीरता से इसके निराकरण की जरूरत है।

✒️ मनीश वर्मा’मनु’

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