विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष
पर्यावरण ही स्थायी अर्थव्यवस्था है।
सुंदरलाल बहुगुणा
भारतीय पर्यावरण आंदोलन के महान पुरोधा सुंदरलाल बहुगुणा का यह कथन आज के दौर में किसी चेतावनी से कम नहीं है।बहुगुणा जी का मानना था कि

प्रकृति और पर्यावरण के बिना किसी भी राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि स्थायी नहीं रह सकती। जंगल, जल, जमीन और जैव विविधता ही मानव सभ्यता की वास्तविक पूंजी हैं। यदि इनका अंधाधुंध दोहन किया जाएगा, तो विकास का पूरा ढांचा अंततः धराशायी हो जाएगा।
विश्वप्रसिद्ध पर्यावरण चिंतक डेविड एटॉमबर्ग ने कहा है”प्राकृतिक संसार पर हमारी निर्भरता पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो चुकी है।” वहीं जलवायु विद जॉन हेनसन ने दशकों पहले चेतावनी दी थी कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो पृथ्वी का तापमान मानव सभ्यता के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बान की मून का कथन भी उल्लेखनीय है— “जलवायु परिवर्तन हमारे समय की सबसे बड़ी सामूहिक चुनौती है।” इन विचारों से स्पष्ट है कि पर्यावरण संकट केवल किसी एक देश का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का प्रश्न बन चुका है।
“पृथ्वी हमारे पूर्वजों से मिली हुई विरासत नहीं है, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों से लिया गया ऋण है।” इसी प्रकार भारतीय पर्यावरणविद् वंदना शिवा का मानना है कि प्रकृति के संसाधनों का अंधाधुंध दोहन अंततः समाज और अर्थव्यवस्था दोनों को संकट में डाल देता है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जब हम प्रकृति और पर्यावरण की चर्चा करते हैं, तब यह प्रश्न अनायास ही मन में उठता है कि क्या विकास की जिस राह पर मानव सभ्यता तेजी से आगे बढ़ रही है, वह वास्तव में विकास की राह है या विनाश की?
आदिम युग से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वर्तमान युग तक मनुष्य ने विज्ञान, तकनीक और संसाधनों के बल पर अभूतपूर्व प्रगति की है। ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, विशाल उद्योग, तीव्र गति से दौड़ते वाहन, वातानुकूलित भवन, आधुनिक मशीनें और डिजिटल तकनीक आज के विकास के प्रतीक माने जाते हैं। निस्संदेह इन उपलब्धियों ने मानव जीवन को अधिक सुविधाजनक बनाया है, किंतु इन सुविधाओं की कीमत प्रकृति को चुकानी पड़ रही है। विकास की अंधी दौड़ ने धरती को इस कदर लहूलुहान कर दिया है कि अब प्रकृति स्वयं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती दिखाई दे रही है। भारत जैसे विशाल और विकासशील देश में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है। देश के अधिकांश महानगर और औद्योगिक नगर वायु, जल तथा ध्वनि प्रदूषण की चपेट में हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पटना, कानपुर, लखनऊ, रायपुर और अन्य अनेक शहरों में प्रदूषण का स्तर चिंताजनक बना हुआ है। सड़कों पर बढ़ते वाहनों का जाल, उद्योगों की चिमनियों से निकलता धुआँ, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, डीजल जनरेटरों का उपयोग तथा वातानुकूलित यंत्रों की बढ़ती संख्या पर्यावरणीय संकट को और गहरा कर रही है।
पर्यावरणविद् और जलवायु वैज्ञानिक वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो मानव सभ्यता को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी आर्थिक विकास भी स्थायी रह सकेगा। आज विश्व भर के पर्यावरण विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास और प्रदूषण 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई पर्यावरणीय असंतुलन का सबसे बड़ा कारण बनती जा रही है। सड़क, रेल, खनन परियोजनाओं, औद्योगिक क्षेत्रों, बाँधों तथा शहरी विस्तार के लिए प्रतिवर्ष लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं। वन केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी के फेफड़े हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, वर्षा चक्र को नियंत्रित करते हैं, मिट्टी का संरक्षण करते हैं और लाखों जीव-जंतुओं का आश्रय स्थल होते हैं।
जब कोई जंगल काटा जाता है तो केवल पेड़ नहीं गिरते, बल्कि उनके साथ पक्षियों के घोंसले उजड़ते हैं, वन्यजीवों का जीवन संकट में पड़ता है और प्रकृति का संतुलन भी डगमगा जाता है। जंगलों के विनाश ने हाथी, बाघ, तेंदुए और अन्य वन्यजीवों को मानव बस्तियों की ओर आने के लिए विवश कर दिया है। परिणामस्वरूप मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है। प्रकृति की यह पीड़ा केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि उन उजड़ते घोंसलों, सूखती नदियों और मौन होते जंगलों में भी दिखाई देती है, जिनकी आवाज़ सुनने का समय आज मनुष्य के पास नहीं है। आज मशीनों और आधुनिक तकनीक ने मानव जीवन को सुविधाजनक अवश्य बनाया है, किंतु इनके अनियंत्रित उपयोग ने पर्यावरणीय संकट को भी जन्म दिया है। उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाली विषैली गैसें, ताप विद्युत संयंत्रों से उत्सर्जित धुआँ, वाहनों से निकलने वाला कार्बन तथा रेफ्रिजरेटर और वातानुकूलित यंत्रों से निकलने वाली गैसें वायुमंडल को प्रदूषित कर रही हैं। यही गैसें ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को गति प्रदान कर रही हैं।
युवा पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने विश्व नेताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि पृथ्वी का भविष्य केवल भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस कार्यों से सुरक्षित होगा। उनका यह संदेश आज पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा और चेतावनी दोनों है। पर्यावरण वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसका परिणाम अत्यधिक गर्मी, अनियमित वर्षा, हिमनदों के पिघलने, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि तथा प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आ रहा है। कभी असम और बिहार में भीषण बाढ़ आती है, तो कभी राजस्थान और बुंदेलखंड सूखे की मार झेलते हैं। कहीं बादल फटने की घटनाएँ बढ़ रही हैं तो कहीं जंगलों में आग लगने की घटनाएँ सामान्य होती जा रही हैं। जल प्रदूषण भी कम गंभीर समस्या नहीं है। नदियों में औद्योगिक अपशिष्ट, रासायनिक पदार्थ, प्लास्टिक और सीवेज का प्रवाह लगातार बढ़ रहा है। अनेक नदियाँ प्रदूषण की वजह से अपना प्राकृतिक स्वरूप खोती जा रही हैं। जो नदियाँ कभी जीवन का आधार थीं, वे आज स्वयं संरक्षण की प्रतीक्षा कर रही हैं। भूजल स्तर में गिरावट और जल स्रोतों का प्रदूषण भविष्य के जल संकट की भयावह तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है।
एक और गंभीर चुनौती प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे की है। आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने उपयोग और फेंकने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। प्लास्टिक के लाखों टन अपशिष्ट नदियों, समुद्रों और भूमि में जमा हो रहे हैं। ये न केवल मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित करते हैं बल्कि पशु-पक्षियों और समुद्री जीवों के लिए भी घातक सिद्ध होते हैं। इलेक्ट्रॉनिक कचरे में मौजूद विषैले तत्व मिट्टी और जल दोनों को प्रदूषित कर रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण का प्रभाव केवल प्रकृति तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। बच्चों और बुजुर्गों में श्वसन संबंधी रोग बढ़ रहे हैं। दमा, एलर्जी, फेफड़ों के संक्रमण, हृदय रोग तथा मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। चिकित्सकों के अनुसार प्रदूषित वातावरण मानव जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है और औसत आयु पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि पर्यावरणीय संकट का बोझ गरीब और वंचित वर्गों पर अधिक पड़ता है। जिन लोगों का जीवन जंगलों, नदियों और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, वे जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षरण के सबसे बड़े शिकार बनते हैं। किसान अनियमित वर्षा से परेशान हैं, मजदूर भीषण गर्मी से प्रभावित हैं और ग्रामीण समुदाय जल संकट का सामना कर रहे हैं।
विडंबना यह है कि जिस विकास को मानव सुख और समृद्धि का माध्यम माना गया था, वही आज उसके अस्तित्व के लिए चुनौती बनता जा रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। सतत विकास की अवधारणा को केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित न रखकर जनआंदोलन बनाया जाना चाहिए। उद्योगों में स्वच्छ तकनीकों का उपयोग, सौर एवं पवन ऊर्जा को बढ़ावा, वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण, व्यापक वृक्षारोपण तथा पर्यावरणीय नियमों का कठोर पालन समय की आवश्यकता है।
विश्व पर्यावरण दिवस केवल औपचारिक भाषणों और पौधारोपण कार्यक्रमों का दिन नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि प्रकृति पर किया गया प्रत्येक आघात अंततः मानव जीवन को ही प्रभावित करता है। यदि आज भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी।
धरती केवल हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, बल्कि हमारी संतानों की अमानत भी है। विकास आवश्यक है, किंतु ऐसा विकास जो प्रकृति को नष्ट कर दे, अंततः विनाश का ही दूसरा नाम है। समय की पुकार है कि हम विकास की अंधी दौड़ को विवेकपूर्ण दिशा दें, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का मार्ग अपनाएँ और पर्यावरण संरक्षण को अपनी जीवनशैली का अभिन्न अंग बनाएँ। तभी यह क्षत-विक्षत धरती पुनः हरित मुस्कान बिखेर सकेगी और मानवता का भविष्य सुरक्षित रह सकेगा।
संजीव ठाकुर,वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक,स्तंभकार,
संजीव-नी।
रोती तड़पती धरती और हम।
रोती तड़पती धरती पर हम,
सपनों के महल सजाते ,
उसकी सूनी होती पलकों पर
विकास के दीप जलाते ।
थककर बैठी नदियाँ अब,
जल के संगीत भूलने लगीं,
कटे वृक्षों की मौन व्यथा में
चिड़ियाँ घर ढूँढ़ने लगीं।
धूप कहीं कुछ ज्यादा तपती,
छाँव बड़ी सहमी-सहमी ,
माटी की कोमल मुस्कानों पर
चिंताओं की रेखा गहरी ।
धरती माँ कुछ कहती होगी,
जब वन के आँचल छिनते ,
उसके कोमल हरे सपनें भी
पत्तों की तरह बिखरते ।
आओ फिर से हाथ बढ़ाएँ,
हरियाली का मान करें,
रोती तड़पती इस धरती का
मिलकर थोड़ा ध्यान करें।
कल,
नन्हों की साँसें हमसे पूछेंगी,
क्या उपहार उन्हें दे पाए?
आओ प्रेम के बीज बोएँ,
ताकि वन फिर मुस्काएँ।
संजीव ठाकुर,रायपुर छत्तीसगढ़,
