यह पता चलते ही कि आने वाले सप्ताह में तीन लगातार छुट्टियाँ आने वाली हैं, मन मचलने लगा । बेताब हो उठा कहीं घूमने जाने के लिए । एक समय वो भी था जब शनिवार और रविवार की

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
नियमित छुट्टियाँ निराश करती थीं । और एक वक़्त अभी का है जब छुट्टियों का इंतज़ार रहता है । वक़्त वक़्त की बात है ।
खैर ! नयी नयी नौकरी और अनजान शहर, अनजान लोग । भाषा की समस्या तो ख़ैर थी ही । जाएँ तो जाएँ कहाँ । अपने मुल्क ( शहर) से काफ़ी दूर । दोस्त अगल बग़ल के रहने वाले थे । शुक्रवार को ही निकल लेते थे । शुक्रवार की शाम से सोमवार की सुबह तक बड़ी मुश्किल से समय कटता था । अभी-अभी तो शहर में आए ही थे सो लाज़मी था किसी मित्र का ना होना । वैसे भी एक तो कुँवारा और दूसरा किसी और मुल्क का । कोई भला क्यूँ बुलाता ।
खैर । बात निकल कर भटकती हुई थोड़ी दूर जा रही है । बहरहाल इन तीन दिनों की छुट्टियों में पटना चले गए । आने के वक़्त अचानक से मन में आया क्यूँ नहीं लखनऊ वापसी कुशीनगर के रास्ते करूँ । पटना जाने के वक़्त तो हमारी रामपयारी अपने परंपरागत रास्ते पर ही थी । तो भाई वापसी में अपनी रामपयारी को हमने छोड़ दिया लखनऊ के रास्ते भाया कुशीनगर । कुशीनगर जहाँ भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था ।
कुशीनगर, जो मल्लों की राजधानी थी । बौद्ध ग्रंथ महापरिनिर्वाण सुत्त के अनुसार यह कुशीनारा तथा कुशीग्राम के नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं, यह उन चार सर्वाधिक पवित्र स्थलों में से एक है, जिन्हें स्वयं भगवान बुद्ध ने पवित्र तीर्थस्थल घोषित किया था। यहीं भगवान बुद्ध ने वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन अपनी अंतिम साँस ली और महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए। यह माना जाता है कि कुशीनगर के मल्लों ने मुकुटबन्धन चैत्य के निकट उनके पार्थिव शरीर का पूर्ण सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया।
लगभग दो शताब्दियों के अंतराल के बाद कुशीनगर पुनः मौर्य काल में प्रमुखता में आया और गुप्त काल में अपने वैभव के चरम पर पहुँचा। इसका प्रमाण उस समय निर्मित अनेक स्तूपों, विहारों तथा अन्य स्थापत्य अवशेषों से प्राप्त होता है। चीनी बौद्ध यात्री Fa-Hien (5वीं शताब्दी ईस्वी), Xuanzang (7वीं शताब्दी ईस्वी) तथा Yijing (8वीं शताब्दी ईस्वी) ने इस स्थान का भ्रमण किया और अपने यात्रा-वृत्तांतों में यहाँ विद्यमान स्थापत्य अवशेषों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है।
यहाँ प्राप्त पुरातात्त्विक अवशेष A. C. L. Carlleyle के द्वारा वर्ष 1876 में किए गए व्यापक उत्खनन तथा बाद में Archaeological Survey of India द्वारा 1904–1912 के बीच संपन्न उत्खननों का परिणाम हैं। इन अवशेषों में मुख्य स्तूप, उसके पश्चिमी भाग में ऊँचे चबूतरे पर स्थित निर्वाण मंदिर तथा उसके चारों ओर बने विहारों का समूह ; दक्षिणी भाग में अलंकृत ईंटों और सजावटी स्तंभिकाओं से युक्त छोटे-छोटे स्तूपों का समूह; पूर्वी भाग में दो-स्तरीय विशाल ईंट निर्मित मंच तथा मुख्य स्तूप के नीचे आंशिक रूप से दबे हुए छोटे स्तूप; और उत्तरी भाग में स्थित अर्पण-स्तूप (वोटिव स्तूप) एवं विहार सम्मिलित हैं। इन संरचनाओं का कालक्रम तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर दसवीं शताब्दी ईस्वी तक विस्तृत है।
पुरातात्त्विक उत्खननों के दौरान यहाँ से अनेक महत्वपूर्ण प्राचीन वस्तुएँ भी प्राप्त हुई हैं, जिनमें अभिलेखयुक्त मृदा-मुद्राएँ (क्ले सील), स्वर्ण एवं रजत मुद्राएँ तथा मिट्टीकी मूर्तियाँ (टेराकोटा प्रतिमाएँ) प्रमुख हैं ।
स्तूप और निर्वाण मंदिर
यहाँ के विस्तृत उत्खनित परिसर में मुख्य स्तूप एव उसके सम्मुख निर्वाण मंदिर आकर्षण के प्रमुख केन्द्र हैं तथा दोनों 2.74 मीटर ऊँचे एक चबूतरे पर निर्मित है। स्तूप का बेलनाकार आधार भूतल से लगभग 19.81 मीटर ऊँचा है। सन् 1927 ई० के उत्खनन् के द्वारा 4.27 मीटर की गहराई पर एक गोल छोटे से कक्ष में एक ताम्रपात्र तथा पाँचवीं शती का एक ताम्र पत्र-अभिलेख मिला था, जिसके ऊपर प्रतीत्य समुत्त्पाद-सूत्र के अतिरिक्त इसके दानकर्ता हरिबल का नाम अंकित है। पुनः 10.36 मीटर नीचे एक लघु स्तूप भी मिला जिस पर प्रथम शती ई० की शैली में ध्यान-मुद्रा में बैठी बुद्ध की मूर्ति है। उसके बाद उसी वर्ष बर्मा के बौद्ध भक्तों के द्वारा प्रदत्त दान स्वरूप इस स्तूप का जीर्णोद्धार किया गया।
निर्वाण मंदिर में बलुए पत्थर की बनी बुद्ध की एक विशालकाय एकाश्म प्रतिमा लेटी हुयी मुद्रा में स्थापित है। 6.10 मीटर लम्बी यह मूर्ति ईटों द्वारा निर्मित आधार पर अवस्थित है, जिसमें लगे एक पश्चिमोन्मुख पत्थर के फलक पर तीन शोकाकुल भक्तों का चित्रण है तथा पाँचवी शती ई० का एक अभिलेख है, जिनमें हरिबल द्वारा मूर्ति स्थापना किए जाने का वर्णन है। इस मंदिर तथा मूर्ति दोनों का उत्खनन् व जीर्णोद्धार 1876 ई० में कार्लाइल द्वारा किया गया। भगवान बुद्ध की 2500वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में भारत सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति की संस्तुति के आधार पर मंदिर का वर्तमान स्वरूप सन् 1956 ई० में दिया गया।
मनीष वर्मा “मनु”
