विछोह
हमारा जीवन भी ना अनुभवों की थाती है। यहाँ मिलने की ख़ुशियाँ जितनी आनंदायक होती हैं बिछड़ने का दर्द उतना ही गहरा होता है

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
जो सीधे नश्तर की तरह दिल में सीधा उतर जाता है । किसी भी चीज़ का छूटना तो वैसे ही पीड़ादायक होता है, पर अगर आपकी कोई प्रिय वस्तु आपसे बिछड़ती है तो उसका दुःख सँभाले नहीं सँभलता है । यह सबसे ख़तरनाक अनुभवों में से एक है जिनसे उबरने में वर्षों लग जाते हैं फिर भी यह कह पाना मुश्किल होता है कि हम उन चीज़ों से उबर भी पाए या नहीं । यह कुछ भी हो सकता है- किसी गहरे रिश्ते का अंत, प्रेम का छूटना या फिर शरीर से प्राण का निकलना । छूटने की यह प्रक्रिया इंसान को अंदर तक झकझोर देती है । प्रेम जब छूटता है तो इंसान जीते जी अधमरा सा होकर रह जाता है । इस विषय पर ख़ासकर समाज में ज्ञान बाँचने वाले बहुतेरे मिल जाएँगे क्योंकि प्रेम और उसके टूटने का अनुभव सार्वभौमिक है । यह महज़ एक व्यक्ति का जाना नहीं बल्कि उसके साथ सोचा हुआ भविष्य और उम्मीद भरे जीवन का एक पल में ढह जाना है ।
प्राण का छूटना एक बहुत ही दुर्लभ रहस्य है । इसका वास्तविक अनुभव केवल वही प्राप्त कर सकता है जिसने इसे भोगा हो और विडंबना यह है कि जो इसे भोग चुका है वह लौटकर इसे बताने के लिए उपलब्ध नहीं है ।
दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो प्रेम का छूटना मानसिक मृत्यु है जबकि प्राण का छूटना शारीरिक । महत्वपूर्ण यह है कि दोनों ही परिस्थितियों में इंसान ख़त्म हो जाता है ।
मृत्यु को स्वीकार करना हालाँकि फिर भी आसान है क्योंकि यह प्रकृति का अंतिम सत्य है, पर जीवित व्यक्ति का छूटना प्रकृति की क्रूरतम व्यवस्था है । यह छोड़ जाता है अपने पीछे यादों का एक अंतहीन सिलसिला और खुद को ना पहचाने जाने जैसी स्थिति से पल पल गुज़रना । आज की दुनिया में जहाँ संवेदनशील व्यक्ति विछोह के अवसाद से जूझ रहा होता है वहीं दूसरी ओर एक बड़ा तबका ऐसा भी है जिसके लिए रिश्ते महज़ एक माध्यम या ज़रिया है अपने ज़रूरतों की पूर्ति का जिसके लिए संवेदनशील व्यक्ति की संवेदनाओं को ही क्यों न भुनाना पड़े।
हालाँकि मैं फिर से दोहरा रहा हूँ- छूटना और बिछड़ना प्रकृति का एक शाश्वत सत्य है । विछोह के बिना मिलन का वास्तविक अर्थ भी व्यक्ति कहाँ समझ पाता है । विछोह के दर्द को समझने वाला व्यक्ति वास्तव में एक संवेदनशील व्यक्ति होता है । उसे रिश्तों की गहरी समझ होती है । पर जिन्होंने रिश्तों को महज़ एक माध्यम समझा है वो भले ही इस दर्द से अपने आप को बचा ले जाएं, पर उनकी बदनसीबी है कि वे ज़िंदगी की इन ख़ूबसूरत अगाध गहराइयों को कहाँ समझ पाते हैं । पूरी दुनिया का साहित्य अगर कहीं कोई मुक़ाम पाता है तो विरह का उसमें अहम योगदान होता है । विछोह के दर्द के साथ कदमताल करते हुए आगे बढ़ना ही दरअसल जीवन जीने की असल कला है ।
दरअसल, विछोह के दर्द के साथ कदमताल करते हुए आगे बढ़ना ही जीवन जीने की असल कला है। जीवन हमें हमेशा हमारी इच्छाओं के अनुरूप नहीं मिलता, लेकिन उसकी परिपक्वता इसी में है कि हम अपने अनुभवों के बावजूद प्रेम करने की क्षमता न खोएँ और अपनी संवेदनशीलता को परिस्थितियों के हाथों मरने न दें।
कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं,
जिंदगी तूने तो धोखे पे दियाभाई धोखा
फ़िराक़ गोरखपुरी
✒️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
