रविवारीय- सोशल मीडिया पर तस्वीरों के जरिए निकटता दिखाने की होड़, क्या हम जीना भूल गए हैं ?

एक अदद तस्वीर

सोशल मीडिया पर अक्सर हमें देखने को मिलता है – किसी नामचीन व्यक्ति के साथ फ़ोटो और साथ में “ आज फ़लाँ से मुलाक़ात हुई । गहन सामाजिक मुद्दों पर चर्चा हुई “ ।
पर अब अगर यही मुलाक़ात किसी राजनीति से जुड़ी हुई हस्ती के

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

साथ हो, तस्वीर जिसे बड़ी मेहनत और मुश्किल से खिंचवाईं गई हो, भले ही उनकी नज़रें कहीं और है और आपकी नज़रें कैमरे पर टिकी हुई हों । कहीं कुछ छूट न जाए वाली फिलिंग के साथ – “ परम आदरणीय फ़लाँ साहब से शिष्टाचार मुलाक़ात हुई । देश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों और विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर सार्थक चर्चा हुई । विचारों का आदान प्रदान हुआ “।
क्या कहना चाहते हैं आप और क्या संदेश प्रेषित हो रहा है । व्यक्तिगत चर्चाओं को व्यक्तिगत ही रखने की ज़रूरत है ।
यहाँ एक बात समझने की ज़रूरत है कि चर्चा वाकई इतनी गहन, गंभीर और सार्थक थी या बड़ी जुगत लगाकर तस्वीर को सार्थकता प्रदान करने के लिए शब्दों का सहारा लिया गया । तसवीरें झूठ नहीं बोलती हैं । ना चाहते हुए भी सच बयां कर जाती हैं ।
फ़िलहाल तो हालात यह है कि हम अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी की इतनी परतें उघाड़ चुके हैं कि आने वाले दिनों में क्या होगा, बस भगवान ही मालिक है । शायद कोई परत ही ना बचे । सोशल मीडिया ने हमारी निजता बिल्कुल ही ख़त्म कर दिया है ।
मिलना जुलना अच्छी बात है । सामाजिक संबंधों को निभाने में कुछ बुराई भी नहीं, पर क्या यह उचित है कि हर मुलाक़ात को सार्वजनिक किया जाए । उन्हें शब्दों के फ़्रेम में डाल दिया जाए । निजता भी कोई चीज़ होती है । आप मिलें, मिलकर सामाजिक मुद्दों पर बेशक चर्चा करें । चर्चा उपरांत उसका निचोड़ क्या निकला यह डालें तो कोई बात हो ।
विडंबना देखिए, जिन सामाजिक मुद्दों पर गहन और सार्थक चर्चा का हम किसी के साथ अपनी तस्वीर खिंचवा कर कुछ दावा करते हैं उसकी प्रासंगिकता शायद ही अगले पोस्ट तक बनी रहे । बड़ी ही अजीब और दिलचस्प दुनिया है सोशल मीडिया की । कुछ मामलों में क्या लगभग सभी मामलों में बाद के किसी सार्वजनिक मंच वो व्यक्ति हमें पहचानता भी नहीं है और हम हैं कि उनका दामन छोड़ने को तैयार नहीं । एक अजीब से आबसेशन से पीड़ित हैं हम ।
सार्वजनिक मंचों पर तो खैर, अपनी तस्वीरें खिंचवाने की होड़ तो मची ही रहती है जिसकी वजह से कभी कभी स्थिति बिगड़ भी जाती है । पता नहीं मुआ एक अदद फ़ोटो में क्या रखा है ।
कयी मर्तबा तो स्थिति हास्यास्पद हो जाती है । इंसान श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा होता है, पर उसकी वहाँ ना होकर कैमरे पर टिकी रहती हैं । शादी के रिसेप्शन के मौक़े पर आप शुभकामनाएँ देने पहुंचते हैं और मंच पर आपका ध्यान कैमरा की ओर रहता है । बड़ा अजीब लगता है । अरे भाई ! जो काम आप कर रहे हैं उसे तो कम से कम शिद्दत से निभाएँ । आप अपना काम करें और कैमरामैन को अपना काम करने दें । क्यों किसी के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहे हैं । ऐसा लगता है मानो तस्वीरें हम अपनी यादों के लिए नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर likes और फ़ालोअर के लिए खिंचवा रहे हैं । शायद हम जीना भूल गए हैं ।
काश ! हम इन तस्वीरों के माध्यम से अपनी निकटता सिद्ध करने के बजाय अपने विचारों से अपनी भावनाओं को व्यक्त करते । मुलाक़ातों का बखान कम करते । संदर्भ , अभिव्यक्ति और विचार ज़्यादा महत्वपूर्ण होते हैं बजाय इसके कि आप सतही तौर पर अपनी बात रखें ।
हमारी पहचान इस बात से ना हो कि हम तस्वीर में किसके साथ खड़े हैं बल्कि इस बात से हो कि हम अपने विचारों और आचरण के साथ कहां खड़े हैं ।
✒️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘

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