आधी सच्चाई का लाइव तमाशा: रिश्तों की मौत का नया मंच

आजकल लोग निजी झगड़ों और रिश्तों की परेशानियों को सोशल मीडिया पर लाइव आकर सार्वजनिक करने लगे हैं, जहां आधी-अधूरी…

कोई पानी डाल दे तो मैं भी चौंच भर पीलूं: चुपचाप मरते परिंदों की पुकार

तेज़ होती गर्मी, घटते जलस्रोत और बढ़ती कंक्रीट संरचनाओं के कारण पक्षियों के लिए पानी और छांव जैसी बुनियादी ज़रूरतें…

डिग्री नहीं, दक्षता चाहिए: नई अर्थव्यवस्था की नई ज़रूरतें

“क्लासरूम से कॉर्पोरेट तक: उच्च शिक्षा और उद्योग के बीच की दूरी” “डिग्री से दक्षता तक: शिक्षा प्रणाली को उद्योग…

“बदलते मौसम, टूटती औरतें”,”सूखे खेत, खाली रसोई और थकी औरतें”

गांव की औरतें, जलवायु की मार: बीजिंग रिपोर्ट की चेतावनी “पानी, पेट और पहचान की लड़ाई: ग्रामीण महिलाओं पर जलवायु…

रविवारीय- “सीने में गोली, लेकिन वार नहीं—जब बदले की आग ने खुद को जला डाला!”

अख़बार के पन्नों की एक चौंकाने वाली सुर्ख़ी थी— “सीने में चीरा लगवाकर रखवाई गोली, बोली—मुझे मारा गया!” पहली बार…

प्राइवेट सिस्टम का खेल: आम आदमी की जेब पर हमला

भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकार आज निजी संस्थानों के लिए मुनाफे का जरिया बन चुके हैं। प्राइवेट…