संस्थाएं डिग्रियां नहीं, ज़िंदगियां दें – तभी शिक्षा का अर्थ है

(जब शिक्षा डर बन जाए) डिग्रियों की दौड़ में दम तोड़ते सपने संभावनाओं की कब्रगाह बनते संस्थान भारत में शिक्षा…

युवा देश, वृद्ध नेतृत्व: क्या लोकतंत्र में उम्र जनादेश से बड़ी है?

✍️ प्रियंका सौरभ भारत आज संसार का सबसे युवा देश है। हमारी जनसंख्या का लगभग पैंसठ प्रतिशत भाग पैंतीस वर्ष…

अख़बारों में साहित्य की हत्या और शब्दकर्मियों की बेइज़्ज़ती

आज के अधिकांश अख़बारों से साहित्यिक पन्ने या तो पूरी तरह गायब हो चुके हैं या केवल खानापूरी तक सीमित…

रविवारीय- चाय की टपरी, जहां दस रुपये में उबलती है दुनिया भर की कहानियां और लोकतंत्र की असहमति

चाय की टपरी एक छोटा सा नाम, पर यादों, मुलाकातों और क़िस्से कहानियों का बड़ा संसार। यह आपको हर जगह…