डिजिटल पत्रकारिता में बढ़े जवाबदेही के मानक, मान्यता प्राप्त सेल्फ रेगुलेटरी बॉडी (SRB) से संबद्धता बने अनिवार्य

पूर्णेन्दु पुष्पेश, महासचिव, वेब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, झारखंड

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के प्रति जवाबदेही का सबसे बड़ा दायित्व भी है। पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज बनना और सच को सामने लाना है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल मीडिया के विस्फोट ने पत्रकारिता के सामने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। आज मोबाइल फोन, एक सस्ता माइक्रोफोन और सोशल मीडिया चैनल के सहारे हजारों नहीं, बल्कि लाखों लोग स्वयं को पत्रकार घोषित कर चुके हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनका पत्रकारिता की शिक्षा, नैतिकता, कानून और पेशेवर आचरण से कोई संबंध नहीं है। परिणाम यह है कि पत्रकारिता के नाम पर उगाही, ब्लैकमेलिंग, चरित्रहनन और सनसनी का एक समानांतर उद्योग खड़ा हो गया है।

दिल्ली हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी इसी बढ़ते खतरे की ओर देश का ध्यान खींचती है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हाथ में मोबाइल और सस्ता माइक्रोफोन लेकर कोई भी स्वयं को पत्रकार घोषित कर देता है, जबकि उसके पास न पत्रकारिता का प्रशिक्षण है, न नैतिक समझ और न ही किसी प्रकार की जवाबदेही। यह टिप्पणी केवल एक मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे डिजिटल मीडिया परिदृश्य की वास्तविक तस्वीर पेश करती है।

आज देश के लगभग हर जिले, हर कस्बे और हर सरकारी कार्यालय के बाहर ऐसे तथाकथित पत्रकार सक्रिय हैं, जिनका उद्देश्य खबर जुटाना नहीं बल्कि डर पैदा करना है। वे किसी अधिकारी, डॉक्टर, शिक्षक, व्यापारी या छोटे कर्मचारी के सामने अचानक कैमरा और माइक लेकर पहुंच जाते हैं। सामने वाला यदि तत्काल जवाब नहीं दे पाता तो वीडियो में उसे दोषी साबित करने की कोशिश होती है। इसके बाद सोशल मीडिया पर भ्रामक शीर्षकों और अधूरी जानकारी के साथ वीडियो प्रसारित किए जाते हैं। कई मामलों में वीडियो हटाने या न चलाने के बदले धन की मांग तक की जाती है। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि कानून की भाषा में जबरन वसूली और समाज की भाषा में “तगादा-गैंग” की गतिविधि है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे लोग वास्तविक पत्रकारों की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। वर्षों की मेहनत, प्रशिक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ काम करने वाले पत्रकार भी जनता की नजर में संदेह के घेरे में आने लगे हैं। जब हर दूसरा व्यक्ति स्वयं को “ब्यूरो चीफ” या “इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर” बताने लगे, तब पत्रकारिता की गरिमा स्वतः प्रभावित होती है।

यह भी स्वीकार करना होगा कि डिजिटल मीडिया ने लोकतंत्र को मजबूत किया है। इसने छोटे शहरों, गांवों और आम नागरिकों को अभिव्यक्ति का मंच दिया है। अनेक स्वतंत्र डिजिटल पत्रकार बेहद उत्कृष्ट और जनपक्षधर काम कर रहे हैं। इसलिए समस्या डिजिटल पत्रकारिता नहीं है, बल्कि उसकी अनियंत्रित और जवाबदेही-विहीन व्यवस्था है। किसी भी पेशे की तरह पत्रकारिता में भी न्यूनतम योग्यता, आचार संहिता और उत्तरदायित्व आवश्यक हैं।

यही कारण है कि अब समय आ गया है जब भारत सरकार डिजिटल पत्रकारिता के लिए स्पष्ट और कठोर नियामक व्यवस्था विकसित करे। विशेष रूप से समाचार आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालित करने वाले पत्रकारों और संस्थानों के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा मान्यता प्राप्त सेल्फ रेगुलेटरी बॉडी (Self-Regulatory Body – SRB) से संबद्ध होना अनिवार्य किया जाना चाहिए। वेब जर्नलिस्ट्स स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (WJSA), जो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में आधिकारिक रूप से पंजीकृत स्व-नियामक निकाय है, जैसी संस्थाओं से संबद्धता डिजिटल पत्रकारों की जवाबदेही और आचार संहिता सुनिश्चित करने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

यदि कोई व्यक्ति किसी मान्यता प्राप्त एसआरबी से संबद्ध नहीं है, तो कम से कम उसके पास पत्रकारिता का औपचारिक प्रशिक्षण होना चाहिए। चाहे वह राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (NSDC) का प्रमाणपत्र हो, किसी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय की पत्रकारिता डिग्री हो, या मान्यता प्राप्त संस्थान का डिप्लोमा। पत्रकारिता कानून, मानहानि, निजता, संवैधानिक अधिकार, मीडिया नैतिकता और तथ्य सत्यापन जैसे विषयों की बुनियादी समझ के बिना किसी को समाचार रिपोर्टिंग का अधिकार देना समाज के साथ अन्याय है।

यह तर्क अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध नहीं है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने का अधिकार देता है, लेकिन पत्रकारिता केवल बोलने का अधिकार नहीं बल्कि सार्वजनिक विश्वास का दायित्व भी है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति केवल स्टेथोस्कोप पहन लेने से डॉक्टर नहीं बन जाता, काला कोट पहन लेने से वकील नहीं बन जाता, उसी प्रकार माइक पकड़ लेने से पत्रकार भी नहीं बन सकता।

सरकार को समाचार आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए चरणबद्ध व्यवस्था लागू करनी चाहिए। इसमें पत्रकारों का पंजीकरण, आचार संहिता का पालन, शिकायत निवारण प्रणाली, तथ्य जांच की अनिवार्यता और दंडात्मक प्रावधान शामिल होने चाहिए। यदि कोई व्यक्ति ब्लैकमेलिंग, फर्जी समाचार, सांप्रदायिक तनाव फैलाने या जबरन वसूली में लिप्त पाया जाए तो उसके विरुद्ध केवल आईटी कानून नहीं, बल्कि पत्रकारिता से जुड़े अधिकारों पर भी रोक लगाई जानी चाहिए। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालित करने वाली कंपनियों को भी ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।

इतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि सरकार इस प्रक्रिया में स्वतंत्र और खोजी पत्रकारिता को किसी प्रकार से बाधित न करे। नियमन का उद्देश्य नियंत्रण नहीं बल्कि उत्तरदायित्व होना चाहिए। ईमानदार पत्रकारों को संरक्षण मिले और फर्जी पत्रकारों पर कार्रवाई हो—यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का संतुलित रास्ता है।

आज पत्रकारिता एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यदि अभी भी व्यवस्था नहीं बनी तो जनता का भरोसा समाचार माध्यमों से लगातार टूटेगा और लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था अपनी विश्वसनीयता खो बैठेगी। इसलिए केंद्र सरकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और विधायिका को मिलकर ऐसा कानून बनाना चाहिए, जिसमें समाचार आधारित डिजिटल पत्रकारिता केवल उन्हीं लोगों को करने की अनुमति मिले जो मंत्रालय से मान्यता प्राप्त एसआरबी, जैसे वेब जर्नलिस्ट्स स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (WJSA) से संबद्ध हों, या कम से कम पत्रकारिता का मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण एवं प्रमाणन रखते हों। यही व्यवस्था वास्तविक पत्रकारों की गरिमा बचाएगी, जनता को फर्जी पत्रकारों के आतंक से मुक्त करेगी और डिजिटल पत्रकारिता को लोकतंत्र का सशक्त, जिम्मेदार और विश्वसनीय स्तंभ बनाएगी।

ऐसी व्यवस्था राष्ट्रस्तर पर आधिकारिक रूप से जब घोषित हो तब हो किन्तु वर्तमान में इन ‘डिजिटल पत्रकारों’ पर लगाम लगाने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रशासन जैसे आयुक्त और उपयुक्त अपने स्वविवेक तथा अधिकारों का उपयोग तो कर ही सकते हैं।

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