बिहार के राज्य विश्वविद्यालयों को उद्योगों के साथ सशक्त साझेदारी की आवश्यकता

प्रमोद कुमार, पटना, बिहार।

उच्च शिक्षा किसी भी राज्य के सामाजिक, आर्थिक एवं तकनीकी विकास का प्रमुख आधार होती है। 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था ज्ञान, नवाचार, अनुसंधान, उद्यमिता एवं कौशल पर आधारित होती जा रही है। ऐसे परिवर्तित परिदृश्य में विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल डिग्री प्रदान करने वाले संस्थानों तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें नवाचार, प्रौद्योगिकी विकास, अनुसंधान, स्टार्टअप संवर्धन तथा उद्योगों के लिए कुशल मानव संसाधन तैयार करने वाले केन्द्रों के रूप में विकसित करना समय की आवश्यकता है।
यह आत्ममंथन का भी समय है कि क्या हमारे राज्य के विश्वविद्यालय 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप युवाओं को तैयार कर पा रहे हैं? क्या विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थी बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, डिजिटल प्रौद्योगिकी और उद्योगों की अपेक्षाओं के अनुरूप कौशल अर्जित कर पा रहे हैं? यदि इन प्रश्नों का ईमानदारी से उत्तर खोजा जाए, इस स्थिति को बदलने का निरंतर प्रयास जरूरी है।

शिक्षा और उद्योग के बीच बढ़ती खाई

यही कारण है कि बिहार के राज्य विश्वविद्यालयों को अब पारंपरिक शिक्षण पद्धति से आगे बढ़ते हुए उद्योगों के साथ सशक्त और संस्थागत सहयोग स्थापित करने की दिशा में ठोस प्रयास करना आवश्यक हो गया है। फलतः इस दिशा में राज्य सरकार निरंतर बेहतर प्रयास भी कर रही है।
आज विश्व स्तर पर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी ज्ञान-आधारित व्यवस्था को बढ़ते अर्थव्यवस्था के लिए मुख्य कारक के रूप में जोड़ा जा रहा है। जिसके कारण कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डेटा विज्ञान, रोबोटिक्स, हरित प्रौद्योगिकी और डिजिटल नवाचार जैसे क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहे हैं। ऐसे समय में उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित नहीं रह सकती। विश्वविद्यालयों को नवाचार, अनुसंधान, कौशल विकास और उद्यमिता के केन्द्र के रूप में विकसित करना होगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा योग्यता ढांचा (NHEQF), राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क (NCrF), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के दिशा-निर्देश तथा “विकसित भारत-2047” की परिकल्पना भी विश्वविद्यालयों एवं उद्योगों के बीच घनिष्ठ सहयोग स्थापित करने पर बल देते हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों को उद्योगों के साथ सशक्त साझेदारी स्थापित करनी चाहिए। बिहार जैसे युवा आबादी वाले राज्य के लिए यह आवश्यकता और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
पारंपरिक शिक्षण पद्धति में बिहार के अधिकांश विश्वविद्यालयों में शिक्षा और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच एक बड़ा अंतर दिखाई देता है। बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त करने के बावजूद रोजगार के लिए अपेक्षित व्यावहारिक कौशल, तकनीकी दक्षता और औद्योगिक अनुभव से वंचित रह जाते हैं। दूसरी ओर, उद्योगों को प्रशिक्षित और योग्य मानव संसाधन उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। ऐसी स्थिति न केवल युवाओं के भविष्य को प्रभावित करती है, बल्कि राज्य के आर्थिक विकास को भी सीमित करती है।

विश्वविद्यालय–उद्योग साझेदारी: समय की मांग

इस चुनौती से निपटने के लिए कुछ उपायों में से एक प्रभावी उपाय के रूप में विश्वविद्यालय–उद्योग सहयोग को संस्थागत स्वरूप देना आवश्यक है। प्रत्येक विश्वविद्यालय में Industry Cell या Corporate Research and Development Cell की स्थापना की जानी चाहिए, जो उद्योगों, स्टार्टअप्स, लघु एवं मध्यम उद्यमों तथा शैक्षणिक विभागों के बीच सेतु का कार्य करे। विश्वविद्यालयों को स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उद्योगों के साथ दीर्घकालिक समझौते करने चाहिए, ताकि विद्यार्थियों को इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, लाइव प्रोजेक्ट और रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकें।
राज्य सरकार के मार्गदर्शन में “बिहार विश्वविद्यालय–उद्योग सहयोग मिशन (Bihar University Industry Collaboration Mission – BUICM)” जैसे नीतिगत कार्य शुरू किए जा सकते हैं। जिसके अंतर्गत विश्वविद्यालय–उद्योग साझेदारी को संस्थागत स्वरूप प्रदान करना, रोजगारपरक एवं कौशल-आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना, अनुसंधान एवं नवाचार को उद्योगों से जोड़ना, स्टार्टअप एवं उद्यमिता संस्कृति का विकास करना जैसे उद्देश्यों को शामिल किया जा सकता है।
साथ ही, विद्यार्थियों की रोजगार क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि के लिए पाठ्यक्रमों को उद्योगोन्मुखी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। पाठ्यक्रम निर्माण समितियों में उद्योग विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डेटा विश्लेषण, फिनटेक, डिजिटल प्रौद्योगिकी और उद्यमिता जैसे विषयों को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।
अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में भी बिहार के विश्वविद्यालयों को नई सोच के साथ आगे बढ़ना होगा और प्रौद्योगिकी आधारित शोध शिक्षा पद्धति अपनानी होगी। उद्योग प्रायोजित शोध, संयुक्त अनुसंधान परियोजनाएं, पेटेंट, प्रोटोटाइप विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की संस्कृति को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
विश्वविद्यालयों में डिजिटल इनक्यूबेशन सेंटर, स्टार्टअप सेल तथा नवाचार केन्द्रों की स्थापना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। आज देश के अनेक प्रतिष्ठित संस्थान उद्योगों के सहयोग से नवाचार और उद्यमिता का सफल मॉडल प्रस्तुत कर रहे हैं। बिहार के विश्वविद्यालय भी इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति कर सकतें हैं।
यह भी ध्यान रखना होगा कि बिहार में कृषि, स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी, खाद्य प्रसंस्करण, ऊर्जा, शिक्षा प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र में अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यदि विश्वविद्यालय इन क्षेत्रों से जुड़े उद्योगों के साथ साझेदारी विकसित करें, तो स्थानीय समस्याओं के समाधान आधारित अनुसंधान को भी प्रोत्साहन मिलेगा। इससे न केवल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलेगी।

विकसित बिहार के निर्माण की दिशा में

निस्संदेह, इस परिवर्तन के लिए केवल विश्वविद्यालयों के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। राज्य सरकार, उद्योग विभाग, शिक्षा विभाग, विश्वविद्यालय प्रशासन, उद्योग संगठनों और नियामक संस्थाओं को मिलकर एक समन्वित रणनीति तैयार करनी होगी। राज्य स्तर पर विश्वविद्यालय–उद्योग सहयोग के लिए विशेष मिशन अथवा नीति तैयार करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
बिहार आज जनसांख्यिकीय दृष्टि से अत्यंत समृद्ध राज्य है। यहां युवाओं की विशाल आबादी एक बड़ी शक्ति है। यदि राज्य के विश्वविद्यालय उद्योगों के साथ प्रभावी और संस्थागत सहयोग स्थापित कर सकें, तो यह युवा शक्ति राज्य के आर्थिक और सामाजिक विकास की आधारशिला बन सकती है।
समय की मांग है कि बिहार के राज्य विश्वविद्यालय पारंपरिक शिक्षण मॉडल से आगे बढ़कर नवाचार, अनुसंधान, कौशल और उद्यमिता आधारित शिक्षा को अपनाएं और स्वयं को बदलते वैश्विक परिदृश्य के अनुरूप पुनर्गठित करें।
उद्योग–विश्वविद्यालय सहयोग केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि विकसित, आत्मनिर्भर और ज्ञान-समृद्ध बिहार के निर्माण का मार्ग भी है। उद्योगों से मजबूत साझेदारी इस परिवर्तन की पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। यदि यह परिवर्तन समय रहते प्रारंभ किया गया और इस युवा शक्ति को गुणवत्तापूर्ण, कौशल-आधारित और उद्योगोन्मुखी शिक्षा उपलब्ध कराई जाए, तो आने वाले वर्षों में बिहार के राज्य विश्वविद्यालय देश के अग्रणी ज्ञान और नवाचार केन्द्रों में अपनी सशक्त पहचान स्थापित करने में स्वतः ही सक्षम हो सकते हैं।

Leave a Reply