रविवारीय- यादों के उजालों में ज़िंदगी का सफ़र: बचपन, सुकून और बदलते दौर की कहानी

“ उजाले अपनी यादों को हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए “
बशीर बद्र साहब ने इन पंक्तियों के माध्यम से न कहते हुए भी बहुत कुछ कह दिया है । उनकी इन पंक्तियों में पुरी ज़िंदगी का

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

फ़लसफ़ा है । शायद उनकी शायरी की यही ख़ासियत है कि शब्द कम होते हैं, पर अर्थ बहुत ही गहरे ।
हर किसी की ज़िंदगी में एक ऐसा वक़्त ज़रूर आता है जब वो अपने पुराने दिनों को याद करना चाहता है । अपनी उन यादों को अपनों के बीच शेयर करना चाहता है । फ़्लैशबैक में जीना अच्छा लगने लगता है । वो उम्र का ही एक हिस्सा होता है । संजीदा व्यक्ति ही उसे महसूस कर सकता है । बाकियों के लिए यह एक कोरी बकवास और बोर लगने वाली बात हो सकती है, पर सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति इस दौर से गुज़रता है और गुज़रने के बाद ही उसे अहसास भी होता है । यह भी उम्र का एक स्वाभाविक हिस्सा है शायद ।
यादें आपके सुपर कम्प्यूटर के हार्ड डिस्क के एक हिस्से में जमा होती रहती हैं और जब ज़िंदगी की आपाधापी से थोड़े फुर्सत में होते हैं तो आप उन यादों के पन्नों को पन्ने दर पन्ने उघाड़ने लगते हैं ।
वो बचपन की यादें । फुर्सत मिलते ही गुल्ली डंडा और कंचे से खेलना । पतंगों के मौसम में दिनभर धागा मंझा करने और कहाँ से पतंगों का जुगाड़ होगा । इस बात कि जुगत में लगे रहना । ज़िंदगी की आपाधापी तो बहुत बाद में समझ आई । उस समय ज़िंदगी की भागदौड़ और संघर्षों का कोई अर्थ भी नहीं होता था । अपना जीवन अगर देखा जाए तो हैप्पीनेस इंडेक्स में अन्यों से थोड़ा उपर ही होगा । चिंता और तनाव शब्द अपने डिक्शनरी में ही नहीं थे । ज़िंदगी खाने पीने और ऐश करने का नाम था । जरूरतें अपनी ज़्यादा नहीं थी और न ही अरमानों की फ़ेहरिस्त थी । समय पर पुरी हो जाती थीं । बहुत सारे विकल्प भी तो नहीं होते थे । आज अपने सामने ढेरों विकल्प हैं और व्यक्ति उन्हीं में खो सा जाता है । उलझ सा गया है बिचारा आम आदमी । ज़िंदगी के अंतिम पड़ाव पर जब वो खाता बही लेकर हिसाब लगाने बैठता है तो पाता है उसने क्या किया । सभी की बैलेंस शीट लगभग एक जैसी होती है ।
याद है हमें वो दिन जब लाइन कटी तो पूरा मुहल्ला सड़कों पर । कहाँ इन्वर्टर और कहाँ जेनरेटर ? गर्मियों में कहाँ एयरकंडीशन की तलब होती थी । कुछ चीज़ें मान ली गई थी कि अपने वश की नहीं है इसलिए अफ़सोस भी नहीं होता था । बराबरी का समाज था । बहुत ऊँच नीच नहीं हुआ करता था । जातियां तो शाश्वत थीं, पर अहसास नहीं था । शायद उनमें तीखा बोध जो नहीं था । ऐसा इसलिए भी हम कह सकते हैं कि शहरों में रहते थे जहाँ इन चीज़ों से सरोकार नहीं के बराबर था । यहाँ लोगों की पहचान उनके काम और व्यवहार से होती है । शहरों में अमुमन नौकरी करने वाले कामकाजू लोग रहते थे । उन सभी की अपनी अपनी प्राथमिकताएँ थीं । आज हम व्यर्थ की बातों में उलझ कर रह गए हैं । इतनी भागदौड़ भरी ज़िंदगी हमें रास आने लगी है कि ज़िंदगी की ख़ूबसूरती हम भूल गए हैं । ज़रूरत है हमें अपने अंदर झाँकने की । अपने आप से बातें करने की । अपने आप को समय देने की ।

मनीष वर्मा “मनु”

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