(मानव गरिमा और न्याय का संतुलन)
डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत की न्याय व्यवस्था केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था भर नहीं है, बल्कि वह समाज के नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं को दिशा देने वाली महत्वपूर्ण व्यवस्था भी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया द्वारा गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश

राणा के मामले में दिया गया निर्णय इसी मानवीय दृष्टिकोण का सशक्त उदाहरण है। पिछले तेरह वर्षों से स्थायी वनस्पतिक अवस्था में जीवन व्यतीत कर रहे हरीश राणा के मामले में अदालत ने उनके परिजनों को जीवन-रक्षक चिकित्सा उपकरण हटाने की अनुमति प्रदान की। यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि मानव जीवन की गरिमा, पीड़ा और नैतिक दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास भी है।
इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पर्दिवाला और न्यायमूर्ति विस्वनाथं की पीठ ने जिस संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का परिचय दिया, वह भारतीय न्याय व्यवस्था की गरिमा को दर्शाता है। विशेष रूप से निर्णय सुनाते समय न्यायमूर्ति पारदीवाला का भावुक होना इस बात का संकेत है कि न्यायालय केवल विधिक तर्कों के आधार पर नहीं चलता, बल्कि वह मानवीय पीड़ा को भी गहराई से समझने का प्रयास करता है।
इच्छामृत्यु का प्रश्न लंबे समय से समाज, चिकित्सा विज्ञान और कानून के बीच बहस का विषय रहा है। सामान्य शब्दों में इच्छामृत्यु का अर्थ है ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति को मृत्यु की अनुमति देना, जब उसका जीवन असाध्य बीमारी या असहनीय पीड़ा से घिरा हो और उसके स्वस्थ होने की कोई संभावना न हो। भारतीय कानून में सक्रिय इच्छामृत्यु अर्थात किसी को जानबूझकर मृत्यु देना स्वीकार्य नहीं है, लेकिन निष्क्रिय इच्छामृत्यु अर्थात जीवन-रक्षक उपचार हटाने की अनुमति कुछ विशेष परिस्थितियों में दी जा सकती है।
हरीश राणा का मामला इसी निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़ा हुआ है। वे पिछले तेरह वर्षों से ऐसी अवस्था में हैं जिसे चिकित्सा विज्ञान में स्थायी वनस्पतिक अवस्था कहा जाता है। इस स्थिति में व्यक्ति जीवित तो रहता है, परंतु उसके मस्तिष्क की चेतन क्रियाएं लगभग समाप्त हो जाती हैं। वह स्वयं निर्णय लेने, बोलने या सामान्य प्रतिक्रिया देने में सक्षम नहीं होता। ऐसे रोगियों का जीवन प्रायः कृत्रिम उपकरणों और निरंतर चिकित्सकीय देखभाल पर निर्भर रहता है।
किसी भी परिवार के लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक होती है। वर्षों तक अपने प्रियजन को अचेत अवस्था में देखना मानसिक और भावनात्मक रूप से अत्यंत कठिन अनुभव होता है। इसके साथ-साथ आर्थिक बोझ भी लगातार बढ़ता जाता है। इसलिए कई बार परिवार यह कठिन निर्णय लेने के लिए मजबूर हो जाता है कि क्या केवल मशीनों के सहारे जीवन बनाए रखना वास्तव में उचित है।
यहीं से इच्छामृत्यु का नैतिक प्रश्न सामने आता है। एक ओर मानव जीवन को सर्वोच्च मूल्य माना जाता है और उसे हर परिस्थिति में बचाने का प्रयास किया जाता है। दूसरी ओर यह भी प्रश्न उठता है कि यदि जीवन केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित रह जाए और उसमें चेतना, संवाद और मानवीय अनुभव समाप्त हो जाएं, तो क्या उसे उसी प्रकार जीवन कहा जा सकता है जैसा हम सामान्य रूप से समझते हैं।
भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर इन जटिल प्रश्नों पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया है। पहले भी अदालत यह स्पष्ट कर चुकी है कि व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है। इसी संदर्भ में यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या व्यक्ति को गरिमा के साथ मृत्यु प्राप्त करने का अधिकार भी होना चाहिए। हालांकि इस विषय में अत्यधिक सावधानी बरतना आवश्यक है, ताकि इसका किसी भी प्रकार से दुरुपयोग न हो सके।
इसी कारण भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं। किसी भी व्यक्ति के मामले में जीवन-रक्षक उपचार हटाने का निर्णय केवल परिवार की इच्छा से नहीं लिया जा सकता। इसके लिए चिकित्सकों की विशेषज्ञ समिति, विस्तृत चिकित्सा परीक्षण और न्यायिक अनुमति जैसी कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्णय पूरी तरह मानवीय हित और चिकित्सकीय तथ्यों के आधार पर लिया जाए।
हरीश राणा के मामले में भी अदालत ने सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करने के बाद ही यह निर्णय दिया। इस फैसले का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह समाज को यह सोचने का अवसर देता है कि जीवन की गरिमा का वास्तविक अर्थ क्या है। केवल शारीरिक अस्तित्व बनाए रखना ही जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता। जीवन में चेतना, संवाद, अनुभव और मानवीय संबंधों का भी उतना ही महत्व है।
इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि इच्छामृत्यु जैसे विषय पर समाज में गंभीर और जिम्मेदार चर्चा हो। कुछ लोग इसे मानवीय पीड़ा से मुक्ति का माध्यम मानते हैं, जबकि कुछ इसे जीवन के मूल्यों के विरुद्ध मानते हैं। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच संतुलन स्थापित करना ही कानून और समाज की सबसे बड़ी चुनौती है।
भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं भी इस विषय को प्रभावित करती हैं। अनेक परंपराओं में जीवन को ईश्वर का उपहार माना जाता है और उसकी समाप्ति को केवल प्राकृतिक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसलिए इच्छामृत्यु के प्रश्न पर लोगों की भावनाएं भी गहराई से जुड़ी होती हैं।
फिर भी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और बदलती सामाजिक परिस्थितियों ने इस विषय को नई दृष्टि से देखने की आवश्यकता उत्पन्न कर दी है। आज चिकित्सा तकनीक इतनी उन्नत हो चुकी है कि कई बार व्यक्ति को लंबे समय तक कृत्रिम रूप से जीवित रखा जा सकता है। ऐसे में यह प्रश्न और अधिक जटिल हो जाता है कि क्या हर परिस्थिति में जीवन को इसी प्रकार बनाए रखना उचित है।
इस संदर्भ में अदालत का यह निर्णय संतुलित दृष्टिकोण का उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह फैसला न केवल कानून की मर्यादा का पालन करता है, बल्कि मानवीय संवेदना को भी सम्मान देता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जीवन की गरिमा और मानवीय पीड़ा दोनों को ध्यान में रखते हुए ही ऐसे मामलों में निर्णय लिया जाना चाहिए।
यह निर्णय स्वास्थ्य व्यवस्था और नीति-निर्माताओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। भविष्य में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ सकती है, क्योंकि चिकित्सा तकनीक लगातार विकसित हो रही है। इसलिए आवश्यक है कि स्पष्ट दिशानिर्देश और पारदर्शी प्रक्रियाएं विकसित की जाएं, ताकि मरीजों और उनके परिवारों को अनिश्चितता और मानसिक तनाव का सामना न करना पड़े।
इसके साथ-साथ समाज को भी यह समझना होगा कि इच्छामृत्यु का प्रश्न केवल कानून का विषय नहीं है। यह मानवीय संवेदना, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ मुद्दा है। ऐसे मामलों में सहानुभूति, संवेदनशीलता और विवेक के साथ विचार करना आवश्यक है।
अंततः, हरीश राणा का मामला हमें यह याद दिलाता है कि न्याय केवल नियमों और प्रावधानों तक सीमित नहीं है। न्याय का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य की गरिमा की रक्षा करना है। जब न्याय व्यवस्था मानवीय पीड़ा को समझते हुए निर्णय लेती है, तब वह केवल कानून लागू नहीं करती, बल्कि समाज को एक नैतिक दिशा भी प्रदान करती है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसी मानवीय दृष्टिकोण का प्रतीक है। यह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि जीवन की रक्षा के साथ-साथ उसकी गरिमा को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए। अंततः एक संवेदनशील समाज वही होता है जो अपने सबसे कठिन नैतिक प्रश्नों का सामना साहस, विवेक और मानवता के साथ कर सके।
डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
(आलेख मे व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
