
भारतीय राजनीति का महासंग्राम और लोकतंत्र का कथित महापर्व का आगाज़ मानो हो गया है। लोकसभा चुनाव 2019 हेतु उन सभी ने कमर कस ली है जो इस ताज को अपने सर चढ़ाना चाहते हैं। भारत की मीडिया ने भी इस पर अपने अपने विचार प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है, और कुछ लोग अपने विचारधारा के समर्थक लोगों के छोटे छोटे समूहों के बड़े बड़े वक्ताओं के पास जाकर देश की राय भी चैनलों के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं।
इन सब के बीच अगर हम बात करें कि प्रधानमंत्री पद की छोटी सी कुर्सी को संभालेगा कौन तो इसके लिए पिछले चुनाव में 56 इंच के सीने की दावेदारी करने वाले नरेंद्र मोदी से लेकर अपने तीव्र दिमाग से कांग्रेस को नईं ऊंचाइयों पर पहुंचाने वाले कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी तक की दावेदारी देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश की जा रही है। ऐसे में इस महासंग्राम में अभी तक मुख्य रूप से 2 समूहों का निर्माण हो गया है साथ मे कई छोटे छोटे समूह ऐसे हैं, जिन्होंने अभी तक गुट निरपेक्ष रहने का निश्चय किया है और कुछ ऐसे भी छोटे छोटे सिपाही हैं जो अपने राष्ट्रीय पार्टी के 20 से 50 कार्यकर्ताओं के साथ इन दोनों गठबंधनों की ओर गठबंधन हेतु हाथ लेकर जा रहे हैं और सरकार बनाने का दावा पेश कर रहे हैं।
लेकिन यह बात अलग है कि प्रस्ताव के अस्वीकार होने के बाद सोशल मीडिया और छोटे छोटे यूट्यूब चैनल के माध्यम से ये लोग अपनी पूरी भड़ास देश की स्वतंत्रता से अभी तक कि स्थिति और सरकार पर निकाल कर दस, बीस, पचास लाइक पर खुश हो जा रहे हैं। अब बात करते हैं कि इन दो मुख्य गठबंधन और इसमें शामिल पार्टियों की वास्तविक स्थिति क्या है तो सबसे पहले हम पिछले 5 वर्षों से देश की सत्तारूढ़ पार्टी जिसने पिछले 70 वर्षों से रोजगार प्राप्त किये सभी कर्मचारियों का रोजगार समाप्त कर दिया और नमक के भाव बिकने वाली पेट्रोल को सोने के भाव बेचना शुरू कर दिया, बुलेट प्रूफ से लैस सेना के हाथ से बन्दूक भी छीन ली और जिसके द्वारा उठाये गए दो छोटे छोटे सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम का भी सबूत मांगा जाता है तो इस पार्टी में अब वह पहले सी लहर नहीं है। क्योंकि इसकी पूरी लहर तो पाकिस्तान चली गयी है जहां के प्रधानमंत्री भी अब भारत से आने वाले चिड़ियों पर ऐसे ध्यान रख रहे हैं जैसे कि उरी फ़िल्म में प्रयोग किया हुआ कोई गरुण ड्रोन पुनः नहीं भेज दिया गया हो, बाकी राजस्थान, छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश की चुनावों के हार के बाद कुछ ऐसा जरूर प्रतीत हो रहा है कि इस पार्टी की छवि थोड़ी कम हुई है लेकिन अब बात जब लोकसभा के चुनाव की है तो शायद इस पर इसका उतना असर नहीं पड़ना चाहिए जितने का अनुमान लगाया जा रहा है। फिर भी अगर कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा करें तो एक तरफ महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन करना इसके लिए अच्छे संकेत हैं वहीं दूसरी तरफ टिकट बांटने में कई बड़े चेहरों को नजरअंदाज करना तथा कुछ प्रत्याशियों को उनके काम के अनुसार नहीं चुन कर उनकी लोकप्रियता को महत्व देते हुए टिकट देना भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है फिर भी यह इतना भी अंतर नहीं ला सकेगा जितने की अपेक्षा की जा रही है।
उधर बिहार में मौसम वैज्ञानिक माने जाने वाले रामविलास पासवान के बंगले के चिराग ने अबकी अपनी मेहनत से प्रकाश क्षेत्र को बढ़ा लिया है और एनडीए के घटक दल में बिहार के साथ झारखंड में भी सीटें प्राप्त करते हुए पिता हेतु भी एक राज्यसभा सीट सुरक्षित कराने में सफल रहे हैं। वर्तमान में भी एनडीए गठबंधन की स्थिति इतनी मजबूत है कि अब विपक्ष पूर्व के सभी मुद्दे भूल कर मात्र भाजपा को हराने के लिए एकजुट हो रहा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष के फोटो के साथ चिपके पोस्टर पर अब यह लिखा होता है कि अगर भाजपा को हराना चाहते हैं तो हमें वोट करें। आशय स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार उन्मूलन का मुद्दा लेकर समर में उतरे लोगों के पास भी अब कोई मुद्दा नहीं बचा रह गया है।
वहीं दूसरी ओर बात करें महागठबंधन की तो यह युद्ध के दूसरे पक्ष सा कम प्रतीत हो रहा है और इसकी स्थिति देखते हुए हम कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री पद की कुर्सी को दूल्हन के रूप में देखा जाए तो महागठबंधन एक पूरी बारात है जिसमें पूर्व के कुछ बुजुर्ग नेता और नेत्री जैसे कि घोटाले के आरोप जेल में सजा काट रहे माननीय लालू प्रसाद यादव, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव समधि की भूमिका में हैं वहीं सोनिया गांधी के वर्तमान तेवर भी किसी दूल्हे की माता से कम नहीं है। हालांकि इस बारात में दूल्हा कौन होगा यह तय नहीं है लेकिन फिर भी बारात पूरी तैयार है। वैसे एक तरह से यह भी देखा जा रहा है कि महागठबंधन की ओर से अबकी बार कोई युवराज नहीं बैठ कर कोई रजिया सुल्तान भी बैठ सकती है। मातृ शक्ति के रूप में पश्चिम बंगाल में लगभग हिन्दू धर्म विरोधी ममता बनर्जी तैयार हैं ही वहीं उत्तर प्रदेश में अंबेडकर जी के कार्यों को महत्व नहीं देते हुए उनकी जाति पर राजनीति करने और जय भीम के नारों को बुलंद कर कुछ विशेष जातियों के समीकरण पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्षा मायावती भी स्वयं को आगामी प्रधानमंत्री के रूप में देख रही हैं।
हालांकि अब जब बात कुर्सी और ताज की है तो इसके राज से सभी अवगत हैं कि यह इतनी आसानी से नहीं मिल पाता अगर कहीं पिता से भी विद्रोह कर लेने वाले युवा कुमार और भतीजे अखिलेश यादव की मति पलटी और कुछ चमत्कार अथवा संयोग से महागठबंधन की स्थिति सरकार बनाने के काबिल हुई तो वे बुआ के इस सपने को भी तोड़ सकते हैं और अपने यादव मुस्लिम समीकरण के साथ टोटी तोड़ने वाले कांड की तरह कुर्सी तोड़ कर घर ला सकते हैं। वैसे यह तो उत्तर प्रदेश की सीटों द्वारा निर्धारित होगा लेकिन वर्तमान में महागठबंधन की बिहार की स्थिति भी कुछ सही नहीं लग रही है। शायद पांडु और धृतराष्ट्र, कौरव-पांडव और उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे इत्यादि के संदर्भ में भी ऐसा ही कुछ हुआ था जो आज बिहार में तेजस्वी और तेजप्रताप के मामले में हो रहा है, पुत्र मोह में फंसे लालू यादव और राजद के लिए भी कुछ बुरे संकेत ही हैं कि घर के ज्येष्ठ पुत्र तेजप्रताप आज कल खफा-खफा चल रहे हैं वैसे यह राजनीति है यहां सब जायज है और ये सब विवाद होते रहते हैं।
ऐसे में महागठबंधन की स्थिति अभी कुछ कही नहीं जा सकती लेकिन प्रियंका गांधी के आने से कई लोगों को चमत्कार की उम्मीद जरूर है और उर्मिला मातोंडकर की सियासी मैदान का अभिनय भी इस तरफ लोगों को खींच रहा है लेकिन 72,000 के कल्पना क्षेत्र से भी बाहर के वादे और रैलियों में पाकिस्तानी झंडों के प्रयोग के साथ चुनावी मुद्दों में देशद्रोह कानून समाप्त करने वाली बात तथा आतंकियों को प्रश्रय देने वाले चुनावी वादों से ऐसी उम्मीद अवश्य लगाई जा रही है कि लुटिया डूब भी सकती है। अब यह महासमर राष्ट्रवाद विरुद्ध अलगाववाद सा लगने लगा है और इसमें देश की जनता शायद राष्ट्रवाद के झंडे तले रहना ही ज्यादा पसन्द भी करेगी। लेकिन इस चुनाव में एक गौर करने वाली बात जो रही है कि लोकप्रियता और राजनीति का पुराना सम्बंध अब और प्रगाढ़ हुआ है लेकिन यह संबंध अब हितकर नहीं है क्योंकि एक खिलाड़ी या अभिनेता कभी राजनीति में अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं कर सकता है और वर्षों से पार्टी हेतु कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को मायूस होना पड़ रहा है और यह टूटता मनोबल राजनीति हित मे दुष्कर है और कला तथा विशेष उपलब्धि हेतु ही राज्यसभा की 12 सीटों का प्रावधान रखा गया है ऐसे में यह कारक चाहे किसी पार्टी का हो राजनीतिक परिपेक्ष्य में अनुचित है। वैसे वर्तमान में दक्षिण भारत से तेजस्वी सूर्या और उत्तर भारत से कन्हैया कुमार युवाओं के केन्द्र बने हुए हैं दोनों में समानता है कि इन दोनों की भाषा सम्प्रेषण कला अतिप्रशंसनीय है और दोनों युवाओं में अपनी अच्छी पकड़ बनाने में सफल भी हो रहे हैं लेकिन एक तरफ जहां तेजस्वी सूर्या देश के एकीकरण पर जोर देते हैं वहीं दूसरी तरफ कन्हैया कुमार पर भारत के टुकड़े करने वाले समूह के साथ संबंध रखने का आरोप है फिर भी यह देखना रोचक होगा कि जनता किसे चुनती है और इस बार ताज किसके सर चढ़ता है।
ऐसे एक्जिट पोल और सर्वे की माने तो वर्तमान सरकार की पुनरावृत्ति होने की अधिक संभावना है हालांकि कई मामलों में वर्तमान सरकार अपने वादों से पीछे दिखी है परंतु कई कार्यों में अपना सर्वश्रेष्ठ देने के कारण यह लोगों के दिलों में अब भी विद्यमान है, और ऐसे अनुमान लगाए जा रहे हैं कि वादे भी तभी पूरे होंगे जब सरकार स्थिर रहेगी और कुछ समय सरकार को प्राप्त होगा ऐसे में हम उम्मीद कर सकते हैं कि इस बार भी हम इसी सरकार के नेतृत्व में इस देश को आगे बढ़ता देखेंगे। हमारी तो आपसे यहीं अपेक्षा है कि आप वोट डालने अवश्य जाएं क्योंकि आमतौर पर मात्र पचास प्रतिशत लोग ही मतदान कर पाते हैं अर्थात मात्र आधी जनसंख्या ही हमारे जनप्रतिनिधियों का चुनाव करती है और जब तक पूरी सहभागिता नहीं होगी हम सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकेंगे।


