ज़ीरो डोज़ बच्चे: टीकाकरण में छूटे हुए भारत की तस्वीर

A parent holds a syringe ready for vaccination, focusing on the inoculation process. A child sits nearby, demonstrating a common healthcare practice and the importance of immunization.

भारत में 2023 में 1.44 मिलियन बच्चे ‘ज़ीरो डोज़’ श्रेणी में थे, जिनमें अधिकांश गरीब, अशिक्षित, जनजातीय, मुस्लिम और प्रवासी समुदायों से आते हैं। भूगोलिक अवरोध, सामाजिक

डाॅ.सत्यवान सौरभ

हिचकिचाहट, शहरी झुग्गियों में अव्यवस्थित शासन और निगरानी की कमी प्रमुख चुनौतियाँ हैं। मिशन इंद्रधनुष जैसी योजनाएँ सीमित प्रभावी रही हैं। समाधान के लिए समुदाय-आधारित सहभागिता, तकनीक आधारित ट्रैकिंग, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और सामाजिक व्यवहार परिवर्तन संचार आवश्यक है। जब तक हम नीति को अंतिम व्यक्ति के अधिकार से नहीं जोड़ते, सार्वभौमिक टीकाकरण केवल एक सपना बना रहेगा। न्यायपूर्ण स्वास्थ्य नीति ही भविष्य की नींव रख सकती है।

✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में सार्वभौमिक टीकाकरण केवल एक स्वास्थ्य अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन जब हम यह देखते हैं कि लाखों बच्चे अब भी ‘ज़ीरो डोज़’ की स्थिति में हैं, यानी उन्हें जन्म के बाद एक भी टीका नहीं मिला, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि हम कहां चूक रहे हैं? क्या हमारी स्वास्थ्य नीति केवल आंकड़ों की बुनियाद पर खड़ी है या फिर वास्तव में समाज के सबसे वंचित तबकों तक इसका लाभ पहुंच रहा है?

लैंसेट (2024) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत में 1.44 मिलियन बच्चे ऐसे थे जिन्हें कोई भी टीका नहीं मिला था। यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि उन परिवारों की अनकही पीड़ा है, जिनके बच्चों को स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित कर दिया गया। ज़ीरो डोज़ बच्चों की सबसे अधिक संख्या उन राज्यों में देखने को मिलती है जहां गरीबी, अशिक्षा, जातीय या धार्मिक हाशियाकरण और प्रशासनिक उदासीनता का मजबूत मेल है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्य इसकी प्रमुख मिसाल हैं, जहां सामाजिक-आर्थिक विषमताएं टीकाकरण की पहुंच को सीमित कर देती हैं।

गरीबी और मातृ शिक्षा का स्तर टीकाकरण में बाधा डालने वाले सबसे बड़े कारकों में से हैं। एक दिहाड़ी मजदूर, जो रोज़ी-रोटी की लड़ाई में सुबह से शाम तक खटता है, उसके लिए बच्चे को लेकर सरकारी अस्पताल जाना एक ‘नुकसानदेह’ निर्णय बन जाता है। यदि उस दिन मजदूरी नहीं हुई, तो पेट नहीं भरता। ऐसे में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच एक विलासिता बन जाती है। इसके साथ-साथ यदि मां अशिक्षित है, तो उसे टीकाकरण की जरूरत, प्रक्रिया और लाभ की पूरी जानकारी नहीं होती। यह जानकारी का अभाव ही बच्चों को स्वास्थ्य अधिकार से वंचित कर देता है।

अन्य महत्वपूर्ण पहलू है जनजातीय, मुस्लिम और प्रवासी समुदायों की स्थिति। इन समुदायों के भीतर टीकाकरण दर बेहद कम है, और इनमें अविश्वास, सांस्कृतिक आशंकाएं, और सरकार के प्रति संदेह गहरे हैं। विशेष रूप से मुस्लिम बहुल इलाकों में धार्मिक भ्रांतियां और अफवाहें टीकाकरण को ‘हराम’ या शरीर पर साजिश मानने तक की धारणा बना देती हैं। कोविड-19 के दौरान फैली झूठी सूचनाएं भी इस अविश्वास को और पुख्ता कर गईं। लोगों ने देखा कि टीकाकरण शिविरों में कोई स्पष्ट संवाद नहीं है, केवल सरकारी दबाव है। इससे उनके बीच डर और बढ़ गया।

शहरी झुग्गियों और दूरस्थ क्षेत्रों की बात करें तो वहां स्वास्थ्य सेवाओं का हाल और भी दयनीय है। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों जैसे नागालैंड, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में दुर्गम भूगोल, सीमित स्वास्थ्यकर्मी और आधारभूत ढांचे की कमी, टीकाकरण कार्यक्रम की सफलता में सबसे बड़ी रुकावट हैं। इन इलाकों में न तो वैक्सीन समय पर पहुंचती है, न ही प्रशिक्षित कर्मी, और न ही माताओं को जानकारी देने वाली फ्रंटलाइन वर्कर।

अब बात करें शासन और कार्यक्रम संबंधी विफलताओं की। मिशन इंद्रधनुष एक महत्वाकांक्षी योजना थी, जिसका उद्देश्य 90% पूर्ण टीकाकरण कवरेज पाना था। लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) के अनुसार यह आंकड़ा केवल 76% तक ही पहुंच सका। कई जिलों में तो यह और भी कम है। इसके पीछे कारण हैं – प्रशासनिक उदासीनता, स्वास्थ्य कर्मचारियों की कमी, और ज़मीनी स्तर पर अनुश्रवण की असफलता। शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य जिम्मेदारियों का बंटवारा राज्य सरकार, नगर निगम और अन्य संस्थानों के बीच इतना उलझा हुआ है कि जवाबदेही कहीं दिखती ही नहीं। एक झुग्गी बस्ती में टीकाकरण की जिम्मेदारी कौन लेगा, इसका कोई स्पष्ट निर्धारण नहीं है।

साथ ही, निगरानी तंत्र की कमी भी एक बड़ी समस्या है। हमारे पास इलेक्ट्रॉनिक वैक्सीन इंटेलिजेंस नेटवर्क (eVIN) जैसी प्रणाली जरूर है, जो वैक्सीन की लॉजिस्टिक ट्रैकिंग करती है, लेकिन यह प्रणाली बच्चे के स्तर तक अनुगमन सुनिश्चित नहीं करती। इससे पता नहीं चल पाता कि किस बच्चे ने कौन सा टीका लिया और कौन छूट गया। कोविड-19 महामारी ने इस पूरे तंत्र को हिला कर रख दिया। जब सारे संसाधन कोविड टीकाकरण में झोंक दिए गए, तब नियमित टीकाकरण जैसे कार्यक्रम पृष्ठभूमि में चले गए, जिससे लाखों बच्चों का टीकाकरण रुक गया।

इन समस्याओं का समाधान केवल घोषणाओं या तकनीकी सुधारों से नहीं हो सकता। इसके लिए नीतिगत बदलावों की आवश्यकता है जो सामाजिक न्याय के मूल्यों पर आधारित हों। सबसे पहले, टीकाकरण योजनाओं को समुदाय-विशेष और क्षेत्र-विशेष रणनीति के तहत चलाना होगा। मिशन इंद्रधनुष 5.0 के तहत उच्च बोझ वाले जिलों में सूक्ष्म नियोजन और सामाजिक व्यवहार परिवर्तन संचार (SBCC) को प्रमुखता देनी होगी। सिर्फ वैक्सीन पहुंचा देना काफी नहीं है, लोगों में विश्वास और भागीदारी पैदा करनी होगी।

इसके लिए हमारी जमीनी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं — जैसे आशा, एएनएम और आंगनवाड़ी वर्कर — को सशक्त बनाना होगा। उन्हें न केवल प्रशिक्षण और मोबिलिटी की सुविधा दी जाए, बल्कि सम्मानजनक प्रोत्साहन भी दिया जाए। स्वास्थ्यकर्मी जब अपने क्षेत्र में भरोसे से काम करेंगे, तभी परिवार उन पर विश्वास करेगा। इसके साथ-साथ, राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन को मजबूती से लागू करना होगा, ताकि झुग्गियों में रहने वाले लाखों बच्चों को भी नियमित टीकाकरण की सुविधा मिले।

तकनीक का प्रयोग तभी सार्थक है जब वह जनहित में हो और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। आधार से जुड़े टीकाकरण रिकॉर्ड, मोबाइल आधारित टीकाकरण वैन, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित डैशबोर्ड इन सबको लागू करना होगा ताकि हर बच्चे का डिजिटल रिकॉर्ड हो और छूटे हुए बच्चों की पहचान तुरंत हो सके। लेकिन तकनीक के साथ मानवीय स्पर्श जरूरी है। टीकाकरण केवल एक इंजेक्शन नहीं, विश्वास का रिश्ता है — यह समझना होगा।

सामुदायिक सहभागिता का महत्व आज और अधिक बढ़ गया है। स्वयं सहायता समूह, धार्मिक नेताओं, शिक्षक-गुरुजनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को अभियान में जोड़ना होगा ताकि यह संदेश हर घर तक पहुंचे कि टीकाकरण बच्चों का अधिकार है, कोई अनावश्यक खतरा नहीं। बांग्लादेश जैसे देश ने यह सिद्ध किया है कि घर-घर जाकर टीकाकरण किया जाए तो पहुंच और स्वीकार्यता दोनों बढ़ती हैं। रवांडा जैसे अफ्रीकी देश में मोबाइल हेल्थ क्लिनिक ने दुर्गम क्षेत्रों में चमत्कारी परिणाम दिए हैं। भारत को इन्हीं से प्रेरणा लेकर अपना मॉडल बनाना होगा।

सरकार को केवल लक्ष्यपूर्ति पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि उसे यह देखना होगा कि कौन छूट रहा है, और क्यों। सामाजिक रूप से बहिष्कृत वर्गों को केंद्र में रखकर नीतियां बनानी होंगी। वरना हम हर साल नई योजनाएं लाते रहेंगे, आंकड़ों में बढ़ोतरी दिखाते रहेंगे, और देश के लाखों बच्चों का बचपन बिना सुरक्षा के, जोखिम में पला करता रहेगा।

भारत का सार्वभौमिक टीकाकरण लक्ष्य तभी साकार होगा जब नीति, नीयत और निष्पादन तीनों स्तरों पर ईमानदारी हो। किसी भी समाज की प्रगति का सबसे बड़ा पैमाना उसका स्वास्थ्य स्तर होता है, और उसमें भी बच्चों का स्वास्थ्य सर्वोपरि है। यदि हम यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं कि हर बच्चे को उसका पहला टीका समय पर मिले, तो हमें खुद से यह पूछना चाहिए — क्या हम सचमुच एक समान और समावेशी राष्ट्र बना रहे हैं?

सार रूप में, भारत को ज़ीरो डोज़ बच्चों की समस्या को केवल स्वास्थ्य मंत्रालय की चिंता मानकर नहीं छोड़ना चाहिए। यह एक राष्ट्रीय चुनौती है, जिसमें सभी विभागों, समुदायों और नागरिकों की भूमिका है। यह न केवल बच्चों के स्वास्थ्य का मामला है, बल्कि देश की भावी पीढ़ी के भविष्य का प्रश्न भी है। यदि हम सब मिलकर टीकाकरण को केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन बना सकें — तो शायद आने वाले वर्षों में ‘ज़ीरो डोज़’ की जगह ‘ज़ीरो वंचना’ का सपना साकार हो सकेगा। यही सपना एक सच्चे लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की बुनियाद है।

✒️ डॉ. सत्यवान सौरभ, स्वतंत्र लेखक व स्तंभकार
(यह लेख भारत में टीकाकरण नीति पर केंद्रित सामाजिक और शासनगत विफलताओं की आलोचना करता है तथा सुधार की संभावनाओं को रेखांकित करता है।)

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