चास का चुनावी रण: अतिप्रचार बनाम ज़मीनी सियासत, भोलू पासवान क्यों आगे दिखते हैं

पूर्णेन्दु पुष्पेश

22 फरवरी, 2026, बोकारो। चास नगर निगम का चुनाव इस बार महज़ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, पुराने जनसंपर्क और नए राजनीतिक प्रयोगों की परीक्षा बन चुका है। चुनावी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है, शह–मात की चालें

पूर्णेन्दु पुष्पेश

चल दी गई हैं और अब 23 फरवरी को मतपेटी तय करेगी कि ऊँट किस करवट बैठता है। प्रचार थम चुका है, लेकिन माहौल में हलचल बाकी है। इस चुनाव की सबसे रोचक बात यह है कि राष्ट्रीय दलों के समर्थित कई चेहरे शुरुआती पंक्ति तक पहुंचने में संघर्ष करते दिखे, जबकि कुछ ऐसे प्रत्याशी आगे निकल आए जो दशकों से समाज के साथ जीवंत संपर्क में रहे हैं। मौजूदा परिस्थितियों में अगली पंक्ति में भोलू पासवान और अबिनाश कुमार स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, लेकिन विश्लेषण कहता है कि सबसे अधिक संभावना भोलू पासवान के पक्ष में बनती दिख रही है।

भोलू पासवान का राजनीतिक कद किसी एक चुनाव का परिणाम नहीं है। वे पहले चास के मेयर रह चुके हैं और लगभग एक दशक से अधिक समय पूर्व युवावस्था में ही सामाजिक सक्रियता का रास्ता पकड़ लिया था। झारखंड युवा शक्ति नामक संस्था बनाकर उन्होंने चास के युवाओं को एक मंच पर जोड़ा और जनसमस्याओं को लेकर संघर्ष का रास्ता चुना। उनका तेवर क्रांतिकारी रहा, लेकिन संघर्ष स्थानीय मुद्दों से जुड़ा रहा -पानी, सड़क, सफाई, बिजली और जनसुविधाओं से संबंधित सवालों पर वे लगातार सक्रिय रहे। यही सक्रियता उन्हें मेयर की कुर्सी तक ले गई। मेयर बनने के बाद भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण समस्याओं से लोगों को राहत दिलाई। आज वे अपने पिछले कार्यकाल की उपलब्धियों का हवाला देकर ‘बिजली के खंभे’ छाप पर वोट मांग रहे हैं। नगर निगम चुनावों में अक्सर मतदाता चेहरा और काम देखते हैं, पार्टी का झंडा नहीं। इस कसौटी पर भोलू पासवान सबसे अनुभवी और परखे हुए प्रत्याशी दिखते हैं।

उनके सामने अबिनाश कुमार मजबूत चुनौती बनकर खड़े हैं। हालाँकि गोपाल मुरारका पिछले मेयर चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे थे। व्यवसायी होने के बावजूद उनकी पहचान एक सक्रिय समाजसेवी की रही है। हेल्पिंग हैंड सहित कई सामाजिक संगठनों से जुड़कर उन्होंने जरूरतमंदों की मदद की है। हजारों मोतियाबिंद मरीजों के निशुल्क ऑपरेशन कराना हो या असहाय लोगों को चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना-इन कार्यों ने उन्हें व्यापक सराहना दिलाई। हाल में चास के श्मशान घाट में वर्षों से पड़ी लावारिश अस्थियों का वैदिक संस्कार कराना भी चर्चा का विषय बना। व्यापारियों के हितों के लिए संघर्ष और सहज, मृदुभाषी व्यक्तित्व उनकी ताकत है। ‘कैमरा’ छाप के साथ वे मैदान में हैं और उनका बढ़ता जनाधार संकेत देता है कि वे हल्के प्रत्याशी नहीं हैं। लेकिन नगर निगम चुनाव में केवल परोपकार ही पर्याप्त नहीं होता; संगठनात्मक मजबूती, बूथ प्रबंधन और पुराने वोट बैंक की निरंतरता भी जरूरी होती है। यही वह क्षेत्र है जहां भोलू पासवान की पकड़ अधिक मजबूत दिखती है।

डॉ परिंदा सिंह सभी प्रत्याशियों में सर्वाधिक शिक्षित मानी जा रही हैं और झारखंड के कद्दावर जननेता स्व समरेश सिंह दादा के परिवार से संबंध होने के कारण उन्हें परंपरागत समर्थकों का आधार मिल रहा है। क्षेत्र में राजपूत समुदाय की गोलबंदी उनके पक्ष में होती दिख रही है। परंतु नगर निगम चुनाव का समीकरण जातीय गोलबंदी से आगे जाकर वार्ड स्तर की गणित पर टिकता है। डॉ परिंदा सिंह का समर्थन आधार उत्साही है, पर क्या वह पूरे शहर में निर्णायक फैलाव रखता है; यह प्रश्न अभी बना हुआ है।

अब बात भाजपा समर्थित प्रत्याशी अविनाश की। वे ‘बिस्कुट’ छाप के साथ मैदान में हैं और पूर्व विधायक विरंची नारायण का समर्थन उन्हें प्राप्त है। संगठनात्मक दृष्टि से भाजपा की पकड़ को कमतर नहीं आंका जा सकता। विधानसभा चुनावों में यह ताकत निर्णायक बनती है। किंतु यह नगर निगम का चुनाव है। यहां स्थानीय छवि और व्यक्तिगत संपर्क अधिक मायने रखते हैं। भाजपा द्वारा इस चुनाव में जिस स्तर का प्रचार किया गया, वह कई मतदाताओं को अतिशयोक्ति जैसा प्रतीत हुआ। सवाल उठता है कि क्या पौधे में इतना खाद डाल दिया गया है कि पौधा ही जल जाए? जरूरत से अधिक प्रचार कभी-कभी उल्टा असर भी डालता है। स्थानीय स्तर पर कुछ नेताओं द्वारा सांप्रदायिक नारेबाजी की चर्चा ने भी समीकरण जटिल कर दिए हैं। क्षेत्र में लगभग पंद्रह प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, जो रणनीतिक मतदान के लिए जाने जाते हैं। वे उस प्रत्याशी के पक्ष में गोलबंद हो सकते हैं जो भाजपा समर्थित उम्मीदवार को पराजित करने की स्थिति में दिखे। इस दृष्टि से भाजपा समर्थित अविनाश की राह आसान नहीं दिखती।

 

राजद समर्थित साधुशरण गोप भी तेवरदार छवि के साथ मैदान में हैं, लेकिन संसाधनों की कमी उनकी गति को सीमित कर रही है। जेल में बंद विनोद कुमार से जुड़े लोगों की गतिविधियां भी चर्चा में हैं, किंतु वे निर्णायक भूमिका में आते नहीं दिखते। कुल मिलाकर मुख्य मुकाबला तीन-चार चेहरों के बीच सिमट गया है।

अब मूल प्रश्न यह है कि भोलू पासवान की संभावना सबसे अधिक क्यों? पहला कारण है उनका पूर्व कार्यकाल। नगर निगम चुनावों में मतदाता अक्सर तुलना करते हैं कि किसने क्या किया, किसका दरवाजा खुला रहा, किसने फोन उठाया। भोलू पासवान इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। दूसरा, उनका संगठनात्मक नेटवर्क। वर्षों की सामाजिक सक्रियता ने उन्हें वार्ड स्तर तक कार्यकर्ताओं का आधार दिया है। तीसरा, विरोधी मतों का बिखराव। गोपाल मुरारका और डॉ परिंदा सिंह के बीच एक वर्ग का वोट विभाजित होता दिख रहा है। भाजपा समर्थित उम्मीदवार भी एक अलग खांचे में वोट ले रहे हैं। ऐसे में भोलू पासवान का कोर वोट यदि संगठित रहता है तो वे बढ़त बनाए रख सकते हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि निगम चुनावों में मतदाता भावनात्मक लहर से अधिक स्थानीय मुद्दों पर निर्णय लेते हैं। अतिप्रचार की मिठास कभी-कभी इतनी अधिक हो जाती है कि स्वाद बिगड़ जाता है। भाजपा का आक्रामक प्रचार आगामी विधानसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार कर सकता है, पर इस चुनाव में यह रणनीति उल्टा असर डालती दिख रही है। नगर निगम में लोगों को ऐसा चेहरा चाहिए जो नाली, सड़क और सफाई के सवाल पर सीधे खड़ा दिखे। इस मानक पर भोलू पासवान की छवि अधिक सुसंगत बैठती है।

प्रशासनिक स्तर पर बोकारो के निर्वाचन पदाधिकारी सह उपायुक्त अजय नाथ झा ने कदाचारमुक्त और शांतिपूर्ण मतदान के लिए व्यापक तैयारी की है। चुनाव से पहले की रात को अक्सर ‘कयामत की रात’ कहा जाता है, क्योंकि इसी समय समीकरण बदलने की कोशिशें होती हैं। यदि कोई अनहोनी नहीं हुई और मतदान शांतिपूर्ण रहा तो मौजूदा आकलन के आधार पर भोलू पासवान की बढ़त कायम रह सकती है।

अंततः लोकतंत्र में अंतिम फैसला मतदाता करता है। पर विश्लेषण यह संकेत देता है कि अनुभव, संगठन और जमीनी संपर्क का संगम भोलू पासवान को इस रेस में सबसे आगे खड़ा करता है। भाजपा समर्थित उम्मीदवार की संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती, किंतु अतिप्रचार और सामुदायिक ध्रुवीकरण की छाया उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है। चास की जनता ने अतीत में भी काम को तरजीह दी है। यदि वही प्रवृत्ति कायम रही तो इस चुनावी शतरंज में ‘बिजली का खंभा’ बाजी मारता दिख सकता है। आज तो सब मतदान करेंगे जिसके बाद सबकी निगाह 23 फरवरी की शाम पर होगी , जब मतपेटी से निकले परिणाम तय करेंगे कि चास की सियासत की अगली सुबह किस नाम के साथ होगी।

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