रविवारीय- उपेक्षित आदत से महंगे इलाज तक का सफ़र है दांत का दर्द

दांत का दर्द—यह वही दर्द है मनु जिसे जिसने कभी झेला है वही इसकी तीव्रता को समझ सकता है। इसकी तुलना अक्सर

मनीश वर्मा, लेखक और विचारक

महिलाओं की प्रसव पीड़ा से की जाती है। साधारण-सा लगने वाला यह अंग जब तक स्वस्थ रहता है, हमें उसकी अहमियत का एहसास ही नहीं होता। लेकिन जैसे ही दांत में दर्द उठता है, इंसान सारी दुनिया भूलकर सिर्फ उसी दर्द से जूझता रह जाता है।
हमारे यहाँ, खासकर पटना जैसे शहरों में, एक समय था जब दांतों के डॉक्टर प्रायः चायनीज़ हुआ करते थे। उस दौर में दांतों को बचाने की बजाय उन्हें उखाड़ देना ही इलाज का आसान और लोकप्रिय तरीका था। कहावत भी यही थी—“ना रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी।” मतलब जब दांत ही नहीं रहेगा तो दर्द कहाँ रहेगा !
उस ज़माने में “कैविटी” को आम बोलचाल की भाषा में खोडर कहा जाता था। खोडर का मतलब था दांत में कीड़ा लगना, और उसका नतीजा होता था असहनीय दर्द। लोग रात-रात भर दर्द से तड़पते, दादी-नानी के नुस्ख़े आज़माते, कभी प्याज का रस तो कभी लौंग का तेल इस्तेमाल करते, लेकिन अंत में राहत का एक ही तरीका बचता—दांत उखड़वाना।
धीरे-धीरे समय बदला। दंतचिकित्सा (Dentistry) ने दांत को उखाड़ने की बजाय उसे बचाने पर ध्यान देना शुरू किया। रूट कैनाल ट्रीटमेंट (RCT) और ब्रिज जैसी आधुनिक तकनीकें आईं। अब डॉक्टरों का कहना था “दांत को बचाइए, यही असली संपत्ति है।” लेकिन इन नए इलाजों ने एक और पहलू सामने ला दिया—अब दांत का इलाज काफ़ी महंगा हो चला था। जिस चीज़ पर कभी लोग ध्यान नहीं देते थे, उस पर पैसे खर्च करना लोगों को भारी लगने लगा।
समय की धारा अब इसी तरह आगे बढ़ती रही और दंतचिकित्सा भी आधुनिकता की नई ऊँचाइयों पर पहुंच गया ।अब सिर्फ दर्द कम करना ही लक्ष्य नहीं रह गया था, बल्कि दांत की सुंदरता और कार्यक्षमता को भी बनाए रखना ज़रूरी हो गया। दांतों की सफाई, पॉलिशिंग, ब्रेसेज़, व्हाइटनिंग और डेंटल इंप्लांट जैसे उपचार सामने आए।
डेंटल इंप्लांट ने तो मानो दांतों के इलाज की परिभाषा ही बदल दी। दांतों के इलाज में मानो क्रांति आ गई ।अब दांत खराब हुआ तो उसे उखाड़कर नया दांत लगा दिया जाता है, बिलकुल असली की तरह। खाने-पीने में कोई परेशानी नहीं, दिखने में कोई अंतर नहीं। मानो विज्ञान ने मुस्कान को फिर से नया जीवन दे दिया हो।
आज स्थिति यह है कि दांत का इलाज केवल बीमारी से मुक्ति भर नहीं रह गया, बल्कि यह स्वास्थ्य और सौंदर्य—दोनों का संगम बन गया है। जहाँ कभी दांत का दर्द एक अभिशाप समझा जाता था, वहीं अब वह आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा की प्रगति का प्रतीक बन चुका है।
अभी कुछ दिनों से मेरे एक मित्र दांतों के दर्द से जूझ रहें हैं । पुराने लगे हुए ब्रिज ने काम करना बन्द कर दिया है और अब वो उछलकर बाहर आ गया है । किसी कारणवश दांतों की पुरानी RCT गड़बड़ा गई है । डाक्टरों की सलाह पर अब एकमात्र विकल्प डेंटल इंप्लांट ही एकमात्र विकल्प था । करवा लिया है उन्होंने । व्यवस्थित होने में थोड़ा वक्त लगता है । उम्मीद है पहले जैसी मुस्कान उनकी वापस आ जाएगी, पर विकल्प तो विकल्प ही रहेगा ।
फिर भी, इस यात्रा का सबसे बड़ा सबक यही है—जिस चीज़ को हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं, वही कभी-कभी जीवन में सबसे बड़ा कष्ट देती है। दांतों की देखभाल छोटी-सी आदत भर लग सकती है, लेकिन यही छोटी-सी आदत हमें उस असहनीय दर्द और महंगे इलाज से बचा सकती है।जिसने रात के सन्नाटे में दांत के दर्द की तपिश झेली है, वह जानता है कि यह मामूली नहीं—यह ज़िंदगी का बड़ा सबक है।
हाँ एक बात मनु तो कहना भूल ही गए। दांतों के इलाज की एक ख़ास बात होती है । आपको बार-बार अपने डॉक्टर के पास जाना होता है । इलाज से पहले और इलाज के बाद यह क्रम जारी रहता है । मरीज़ और डॉक्टर के बीच बार-बार आने जाने की वजह से एक औपचारिक रिश्ता सा बन जाता है । और किसी मर्ज़ के इलाज में शायद यह बात नहीं होती है-

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘

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