पत्रकारिता की गिरती गरिमा और राजनीति की बिगड़ती भाषा

डॉ. प्रियंका सौरभ

लोकतंत्र केवल वोट देने का अधिकार नहीं होता, वह एक सतत संवाद की प्रक्रिया है—जहाँ सवाल पूछे जाते हैं, जवाबदेही तय होती है और असहमति को सम्मान के साथ सुना जाता है। इस

प्रियंका सौरभ

संवाद को जीवित रखने का जिम्मा जिन दो प्रमुख स्तंभों पर टिका होता है, वे हैं—पत्रकारिता और राजनीति। लेकिन आज यही दोनों स्तंभ अपने मूल स्वरूप से भटकते दिखाई दे रहे हैं। पत्रकारिता अपनी गरिमा खोती जा रही है और राजनीति अपनी भाषा। यह गिरावट केवल संस्थाओं की नहीं, बल्कि पूरे समाज के चरित्र का आईना बनती जा रही है।

एक दौर था जब पत्रकारिता को मिशन कहा जाता था। अखबारों के संपादकीय केवल शब्दों का समूह नहीं होते थे, बल्कि विचारों की मशाल होते थे। पत्रकार सत्ता के सामने खड़े होकर सवाल पूछने का साहस रखते थे। उनके शब्दों में सच्चाई की ताकत होती थी, और जनता उन्हें भरोसे के साथ पढ़ती थी। लेकिन आज पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा “खबर” से ज्यादा “नज़ारा” बन गया है। कैमरों की चमक, एंकरों की ऊँची आवाज़ और बहसों का शोर—इन सबने मिलकर पत्रकारिता की गंभीरता को कहीं पीछे छोड़ दिया है।

आज खबरों का चयन इस आधार पर नहीं होता कि क्या जरूरी है, बल्कि इस आधार पर होता है कि क्या “ट्रेंड” करेगा। किसी मुद्दे की गहराई में जाने की बजाय उसे सतही तरीके से परोसना ज्यादा आसान और लाभकारी समझा जाता है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है, जहाँ हर व्यक्ति “सूचना” का स्रोत बन गया है, लेकिन सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली हो गई है। इस माहौल में जिम्मेदार पत्रकारिता करना एक चुनौती बन गई है, लेकिन दुर्भाग्य से कई संस्थान इस चुनौती से बचने का रास्ता चुन रहे हैं।

पत्रकारिता की इस गिरावट के पीछे केवल तकनीकी बदलाव ही जिम्मेदार नहीं हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण आर्थिक और राजनीतिक दबाव भी है। मीडिया हाउस बड़े कॉर्पोरेट समूहों के अधीन आते जा रहे हैं, जिनके अपने हित और एजेंडे होते हैं। विज्ञापन का दबाव संपादकीय स्वतंत्रता को सीमित करता है। ऐसे में “सच” अक्सर “सुविधाजनक सच” बनकर रह जाता है। सवाल यह है कि अगर पत्रकार ही समझौता करने लगेंगे, तो आम जनता के हितों की रक्षा कौन करेगा?

दूसरी ओर, राजनीति की भाषा भी लगातार गिरावट की ओर बढ़ रही है। सार्वजनिक मंचों पर नेताओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा अब पहले जैसी मर्यादित और संयमित नहीं रही। व्यक्तिगत हमले, कटाक्ष, अपमानजनक शब्द और यहां तक कि नफरत फैलाने वाले बयान भी आम होते जा रहे हैं। यह केवल शब्दों की गिरावट नहीं है, बल्कि सोच की गिरावट का भी संकेत है।

राजनीति में असहमति होना स्वाभाविक है। विचारों का टकराव लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन जब यह टकराव व्यक्तिगत अपमान और अशिष्टता में बदल जाता है, तो वह लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुँचाता है। दुर्भाग्य से आज कई नेता लोकप्रियता पाने के लिए जानबूझकर उत्तेजक और विवादास्पद भाषा का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि इससे उन्हें तुरंत ध्यान और समर्थन मिल सकता है।

यह प्रवृत्ति इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि नेता समाज के लिए उदाहरण होते हैं। जब वे सार्वजनिक रूप से अशिष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं, तो समाज का एक हिस्सा उसे सामान्य मानने लगता है। धीरे-धीरे यह भाषा हमारे रोजमर्रा के संवाद का हिस्सा बन जाती है। परिवार, स्कूल और समाज—हर जगह इसका असर दिखाई देने लगता है।

पत्रकारिता और राजनीति की यह गिरावट एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। जब पत्रकारिता कमजोर होती है, तो राजनीति को अपनी भाषा और व्यवहार सुधारने की जरूरत महसूस नहीं होती। और जब राजनीति का स्तर गिरता है, तो पत्रकारिता भी उसी स्तर पर आकर बहस करने लगती है। इस तरह एक दुष्चक्र बन जाता है, जो लोकतंत्र को भीतर से खोखला करता है।

इस संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—जनता की भूमिका। अक्सर हम यह मान लेते हैं कि सारी जिम्मेदारी नेताओं और पत्रकारों की है, लेकिन सच्चाई यह है कि हम भी इस व्यवस्था का हिस्सा हैं। हम क्या देखते हैं, क्या पढ़ते हैं और किसे समर्थन देते हैं—यह सब तय करता है कि समाज किस दिशा में जाएगा। अगर हम सनसनीखेज खबरों को ज्यादा महत्व देंगे, तो मीडिया वही दिखाएगा। अगर हम अशिष्ट भाषा बोलने वाले नेताओं को समर्थन देंगे, तो राजनीति उसी दिशा में आगे बढ़ेगी।

आज जरूरत है आत्ममंथन की—सिर्फ पत्रकारों और नेताओं के लिए नहीं, बल्कि हर नागरिक के लिए। पत्रकारिता को अपने मूल सिद्धांतों—सत्य, निष्पक्षता और जिम्मेदारी—की ओर लौटना होगा। उसे यह समझना होगा कि उसकी ताकत उसकी विश्वसनीयता में है, न कि उसकी आवाज़ की ऊँचाई में। उसे यह तय करना होगा कि वह सत्ता का सहयोगी बनेगा या जनता का प्रहरी।

राजनीति को भी अपनी भाषा और आचरण पर पुनर्विचार करना होगा। नेताओं को यह समझना होगा कि उनके शब्द केवल राजनीतिक हथियार नहीं हैं, बल्कि सामाजिक संस्कारों को गढ़ने वाले उपकरण भी हैं। मर्यादा, संयम और सम्मान—ये केवल आदर्श शब्द नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवश्यकता हैं।

शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक संस्थाओं की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। बच्चों और युवाओं को यह सिखाना होगा कि असहमति को कैसे सभ्य तरीके से व्यक्त किया जाता है। उन्हें यह समझाना होगा कि बहस का मतलब शोर नहीं, बल्कि तर्क होता है। अगर हम आने वाली पीढ़ी को सही दिशा नहीं देंगे, तो यह संकट और गहरा हो जाएगा।

डिजिटल युग में यह चुनौती और भी जटिल हो गई है। फेक न्यूज, ट्रोलिंग और ऑनलाइन हेट स्पीच ने संवाद की गुणवत्ता को और गिरा दिया है। ऐसे में जिम्मेदार नागरिक बनने की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है। हमें हर सूचना को परखना होगा, हर बयान को समझना होगा और हर प्रतिक्रिया को सोच-समझकर देना होगा।

अंततः यह समझना जरूरी है कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं का ढांचा नहीं है, बल्कि एक जीवंत संस्कृति है। यह संस्कृति तभी फलती-फूलती है, जब उसमें संवाद की शालीनता, विचारों की गहराई और जिम्मेदारी की भावना होती है। अगर पत्रकारिता अपनी गरिमा खो दे और राजनीति अपनी भाषा, तो यह संस्कृति धीरे-धीरे खत्म होने लगती है।

आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ हमें तय करना है कि हम किस दिशा में जाना चाहते हैं। क्या हम शोर, सनसनी और अशिष्टता के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे, या फिर सच्चाई, शालीनता और जिम्मेदारी को अपनाएंगे? यह फैसला केवल नेताओं और पत्रकारों का नहीं, बल्कि हम सबका है।

अगर हमने समय रहते इस गिरावट को नहीं रोका, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा—जहाँ चुनाव तो होंगे, लेकिन संवाद नहीं। और जहाँ संवाद नहीं होता, वहाँ लोकतंत्र भी नहीं होता।

इसलिए यह समय चेतावनी का है, लेकिन साथ ही अवसर का भी। अगर हम जागरूक होकर सही दिशा में कदम बढ़ाएं, तो हम इस संकट से उबर सकते हैं। पत्रकारिता फिर से अपनी गरिमा पा सकती है, राजनीति फिर से अपनी मर्यादा। और लोकतंत्र—वह फिर से अपने असली अर्थ में जीवित हो सकता है।

 

डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार

 

(आलेख मे व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)

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