रविवारीय- प्राकृतिक आपदाएँ चेतावनी नहीं देतीं, लेकिन सबक ज़रूर छोड़ जाती हैं — संतुलित विकास ही समाधान

अभी कुछ दिनों पहले की ही घटना है , उत्तरकाशी ज़िले का धराली गाँव —एक शांत, बेहद ख़ूबसूरत , हिमालय की वादियों में स्थित

मनीश वर्मा, लेखक और विचारक

एक छोटी सी बस्ती। लेकिन अचानक आसमान में काले काले बादल घिर आते हैं और बिना किसी चेतावनी के, पहाड़ की ढलान पर बादल फट जाते हैं । और परिणाम हम सभी के सामने है । देखते ही देखते, महज़ चालीस सेकंड में पानी, मलबा और पत्थरों का एक रौद्र प्रवाह पूरा का पूरा गाँव को अपनी गिरफ्त में ले लेता है ।जब तक लोग कुछ समझ पाते, इससे पहले ही सैलाब घर, दुकानें, खेत—सब बहा ले जाता है। बच जाता है तो सिर्फ और सिर्फ़ चारों ओर तबाही का मंजर। चीखते-चिल्लाते लोग, जान बचाने को भागते, गिरते-पड़ते ग्रामीण, मलबे में दबे इंसान और मवेशी ,टूटे-फूटे घर, सड़कें और बिजली के खंभे।
कुछ ही पलों में, क ई ज़िंदगियाँ हमेशा के लिए बदल जाती हैं। कई परिवार उजड़ जाते हैं, सैकड़ों लोग लापता हो जाते हैं।चारों ओर तबाही फैल जाती है । पल भर में सब कुछ ख़त्म । दुनिया बदल गई लोगों की । जो लोग बच गए हैं उनके लिए ताउम्र यह एक दु:स्वप्न की तरह है । अपनों को खोना और उनकी यादों के सहारे बची हुई जिंदगी जीना वाकई एक दु:स्वप्न है I जिन्होंने अपनों को खोया जय वही इसी दर्द को महसूस कर सकता है I
अभी विगत मंगलवार को कुछ इसी तरह का हादसा वैष्णो देवी मार्ग पर अर्ध्कुवारी के पास हुआ जहाँ पहाड़ पर से मलबों और पत्थरों के गिरने और उनमे दब जाने की वज़ह से लगभग ३५ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी I इस प्रकार की और भी छोटी छोटी घटनाये घट रहीं हैं I आये दिन अख़बारों में इनकी खबर छपती है I हमें भी शायद आदत सी हो गई है I हम महज़ खबर की तरह उन्हें पढ़ते हैं I हमारी भावनाएं वहां बिलकुल आहत नहीं होती हैं , क्योंकि वहां हमारा कोई नहीं होता है I हमने अपने परिवार के किसी सदस्य को वहां नहीं खोया है I ऐसा लगता है हम बिलकुल ही आत्मकेंद्रित हो गए हैं I हमें आसपास की घटनाये उद्वेलित नहीं करती हैं तब तक, जब तक की हम और हमारे परिवार के लोग उसमे न हों I
एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सेना के जवान जब तक मोर्चा संभालते हैं, तब तक तो बहुतों की दुनिया बदल जाती है I वे मलबे से लोगों को निकालने, घायलों को अस्पताल पहुँचाने और बचाव कार्य में जुट जाते हैं। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। क्यों होती है इतनी तबाही?
प्राकृतिक आपदाएँ — चाहे भूकंप हों, भूस्खलन, पहरों पर से पत्थरों का गिरना , बाढ़ या बादल फटना — पूरी तरह रोकी नहीं जा सकतीं। वे तो समय-समय पर आती ही रहेंगी। लेकिन इनसे होने वाले नुक़सान को कम किया जा सकता है, बशर्ते हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाएँ। हम पहाड़ों के साथ क्या कर रहे हैं? प्रकृति ने पहाड़ों को अद्भुत संसाधनों और नैसर्गिक सौंदर्य से नवाज़ा है। परंतु हमने—विकास के नाम पर पहाड़ों को काटकर चौड़ी-चौड़ी सड़कें बनाई ,चट्टानों को तोड़ा, जंगलों से अनगिनत पेड़ उखाड़े, नदियों के किनारे रिहायशी इलाक़े और होटल खड़े कर दिए , बाँधों का अंधाधुंध निर्माण किया ।
यह सब बिना सोचे-समझे सिर्फ़ पर्यटन और विकास के नाम पर हुआ। लेकिन असल में हम पहाड़ों के प्राकृतिक संतुलन से छेड़छाड़ कर रहे हैं। नदियाँ, पहाड़ और जंगल सिर्फ संसाधन नहीं — ये हमारे जीवन प्रणाली की रक्षा-कवचें हैं। हमें विकास, पर्यटन और पर्यावरण के साथ संतुलन साधने की ज़रूरत है । अब वक़्त आ नहीं गया बल्कि पूरा होने को है । अब नहीं जागेंगे तो फिर देर हो जाएगी। हमें पहाड़ों में निर्माण कार्य के लिए सख़्त और वैज्ञानिक नीति अपनानी होगी । पहाड़ों पर और पहाड़ी नदी तटों पर निर्माण पर पूरी रोक लगानी पड़ेगी। सिर्फ और सिर्फ पर्यटन एवं विकास के नाम पर हम कब तक यूँ सच्चाई से मुंह मोड़ लोगों की जान से खिलवाड़ करते रहेंगे I

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘

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