ममता सरकार ने बंगाल के गौरवशाली संस्थानों को राजनीतिक अराजकता का केंद्र बनाया : धर्मेंद्र प्रधान

पटना। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पश्चिम बंगाल के शैक्षणिक संस्थानों की वर्तमान स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का बंगाल के संस्थानों को उनके पुराने गौरव और शैक्षणिक उत्कृष्टता पर वापस लाने का संकल्प, असल में बंगाल के भविष्य को सुरक्षित करने का आह्वान है। जादवपुर विश्वविद्यालय  की घटना का संदर्भ देते हुए श्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यूजीसी की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट ममता सरकार की विफलता का एक पुख्ता दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि जिस संस्थान ने कभी देश को महान शिक्षाविद और वैज्ञानिक दिए, आज वहां का प्रशासन ‘लापरवाह’ और ‘जवाबदेही से शून्य’ हो चुका है। यूजीसी समिति द्वारा एंटी-रैगिंग ढांचे को ‘कमजोर’ बताना और अनुदान में 10% कटौती की सिफारिश करना यह दर्शाता है कि राज्य सरकार ने परिसरों को केवल राजनीतिक प्रभाव के लिए इस्तेमाल किया है। केंद्रीय मंत्री  ने कहा कि टीएमसी शासन के तहत बंगाल के विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक जिम्मेदारी के बजाय राजनीतिक हस्तक्षेप को प्राथमिकता दी गई है, जिससे सुरक्षा तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। उन्होंने  कहा कि कैंपस में “भय मुक्त” वातावरण प्रदान करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी थी, जिसमें वह पूरी तरह विफल रही है। श्री प्रधान ने स्पष्ट किया कि बंगाल का छात्र अब गिरावट को अपनी नियति नहीं मानता। राज्य में शैक्षणिक संस्थानों के सुधार की मांग अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा सुधार की बात करने पर मुख्यमंत्री का विचलित होना यह दर्शाता है कि उन्हें बंगाल के युवाओं की शिक्षा से अधिक अपनी राजनीतिक पकड़ खोने का डर है। बंगाल के लोग अब यह समझ चुके हैं कि असली खतरा उन संस्थानों से नहीं, बल्कि उस राजनीति से है जिसने दशकों तक इन संस्थानों को पंगु बनाए रखा।

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