चिप्स की जंग में भारत की एंट्री

(सेमीकंडक्टर सहयोग और बदलती वैश्विक रणनीति)

डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत और अमेरिका के बीच सेमीकंडक्टर तथा उन्नत तकनीकी सहयोग को लेकर हुआ हालिया करार केवल एक द्विपक्षीय समझौता नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन, तकनीकी प्रभुत्व और आर्थिक सुरक्षा की दिशा में एक निर्णायक

प्रियंका सौरभ

कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। इक्कीसवीं सदी में जिस तरह तेल को बीसवीं सदी की सबसे रणनीतिक वस्तु माना गया था, उसी तरह आज सेमीकंडक्टर को आधुनिक दुनिया की रीढ़ कहा जा सकता है। मोबाइल फोन से लेकर मिसाइल प्रणाली, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर ऑटोमोबाइल उद्योग तक—हर क्षेत्र में चिप्स की अनिवार्यता ने इसे भू-राजनीति का केंद्र बना दिया है। ऐसे में भारत का पैक्स सिलिका जैसे ढांचों में शामिल होना और अमेरिका के साथ गहरा सहयोग स्थापित करना दूरगामी महत्व रखता है।

पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला की कमजोरियां खुलकर सामने आई हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान चिप संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि कुछ गिने-चुने देशों और कंपनियों पर अत्यधिक निर्भरता पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकती है। इस निर्भरता का सबसे बड़ा केंद्र चीन और ताइवान क्षेत्र रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने इसे केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के रूप में देखा है। इसी पृष्ठभूमि में भारत जैसे लोकतांत्रिक, स्थिर और तेजी से उभरते बाजार वाले देश की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत लंबे समय तक सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में एक सीमित भूमिका निभाता रहा है, जहां उसका योगदान मुख्यतः चिप डिजाइन और आईटी सेवाओं तक सीमित था। हालांकि निर्माण, कच्चे माल की शुद्धता, और अत्याधुनिक फैब्रिकेशन जैसी क्षमताओं में देश पीछे रहा। हालिया समझौते इस कमी को दूर करने की दिशा में संकेत देते हैं। अमेरिका के साथ साझेदारी भारत को न केवल तकनीकी ज्ञान और निवेश उपलब्ध कराएगी, बल्कि वैश्विक मानकों के अनुरूप एक मजबूत और भरोसेमंद सप्लाई चेन का हिस्सा भी बनाएगी।

इस सहयोग का एक महत्वपूर्ण पहलू दुर्लभ खनिजों और उच्च गुणवत्ता वाले सिलिकॉन जैसे कच्चे माल से जुड़ा है। सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है, उनमें से कई का वैश्विक नियंत्रण चीन के पास है। यह स्थिति रणनीतिक जोखिम पैदा करती है। भारत-अमेरिका सहयोग इस निर्भरता को कम करने और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने की दिशा में अहम कदम है। भारत के पास खनिज संसाधनों की संभावनाएं हैं, जिन्हें तकनीक और निवेश के माध्यम से वैश्विक आपूर्ति शृंखला से जोड़ा जा सकता है।

आर्थिक दृष्टि से यह करार भारत के लिए बड़े अवसर खोलता है। सेमीकंडक्टर उद्योग पूंजी-प्रधान होने के साथ-साथ रोजगार सृजन की अपार क्षमता रखता है। एक फैब्रिकेशन यूनिट के आसपास पूरा एक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होता है, जिसमें आपूर्तिकर्ता, अनुसंधान संस्थान, स्टार्टअप्स और कुशल मानव संसाधन शामिल होते हैं। इससे न केवल प्रत्यक्ष रोजगार बढ़ेगा, बल्कि उच्च तकनीकी कौशल वाले युवाओं के लिए नए रास्ते खुलेंगे। यह भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश को वास्तविक आर्थिक शक्ति में बदलने में सहायक हो सकता है।

रणनीतिक स्तर पर यह साझेदारी भारत की विदेश नीति में भी एक नया आयाम जोड़ती है। भारत लंबे समय से “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति का पालन करता आया है, जहां वह किसी एक शक्ति गुट पर निर्भर न रहते हुए अपने हितों के अनुसार सहयोग करता है। अमेरिका के साथ यह तकनीकी सहयोग उसी संतुलन का उदाहरण है। यह भारत को पश्चिमी देशों के साथ निकटता तो देता है, लेकिन साथ ही उसे वैश्विक आपूर्ति शृंखला में एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में स्थापित करता है। इससे भारत की वैश्विक सौदेबाजी क्षमता भी मजबूत होती है।

हालांकि इस पूरे परिदृश्य में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सेमीकंडक्टर निर्माण अत्यंत जटिल और लागत-भारी प्रक्रिया है, जिसमें निरंतर नवाचार, स्थिर नीतिगत समर्थन और दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता होती है। भारत में बुनियादी ढांचे, बिजली की गुणवत्ता, जल उपलब्धता और कुशल श्रमबल जैसी समस्याओं को हल किए बिना इस उद्योग में वैश्विक प्रतिस्पर्धा संभव नहीं है। इसके अलावा, तकनीकी हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़े मुद्दे भी संवेदनशील हैं, जिनका संतुलित समाधान आवश्यक होगा।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत इस सहयोग को केवल आयात-प्रतिस्थापन तक सीमित रखेगा या इसे नवाचार-आधारित आत्मनिर्भरता में बदल पाएगा। यदि भारत केवल विदेशी कंपनियों के लिए एक उत्पादन स्थल बनकर रह जाता है, तो दीर्घकालिक लाभ सीमित होंगे। आवश्यकता इस बात की है कि देश में अनुसंधान और विकास को समानांतर रूप से बढ़ावा दिया जाए, विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच गहरा तालमेल बने, और घरेलू स्टार्टअप्स को इस पारिस्थितिकी तंत्र में स्थान मिले। तभी भारत वास्तव में सेमीकंडक्टर क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ सकता है।

भू-राजनीतिक संदर्भ में यह करार एक स्पष्ट संदेश भी देता है। यह संदेश केवल चीन को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को है कि लोकतांत्रिक देश मिलकर तकनीकी आपूर्ति शृंखला को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और विविधतापूर्ण बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वह किसी नए ध्रुवीकरण का मोहरा न बने, बल्कि अपनी विकासात्मक प्राथमिकताओं को केंद्र में रखे।

अंततः, भारत और अमेरिका के बीच सेमीकंडक्टर सहयोग भविष्य की उस दुनिया की झलक देता है जहां तकनीक, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा आपस में गहराई से जुड़ी होंगी। यह भारत के लिए एक अवसर है कि वह खुद को केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में स्थापित करे। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नीतिगत इच्छाशक्ति, संस्थागत क्षमता और दीर्घकालिक दृष्टि को किस हद तक व्यवहार में उतारा जाता है। यदि यह संतुलन साध लिया गया, तो यह करार भारत की तकनीकी यात्रा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

 

डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार

 

(आलेख मे व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं)

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