सम्मान की आड़ में बढ़ता दिखावा, और संघर्षरत प्रतिभाओं की अनदेखी—क्या ये समारोह प्रेरणा हैं या केवल प्रभाव दिखाने का मंच?
डॉ. सत्यवान सौरभ
देशभर में IAS और IPS जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं में चयनित अभ्यर्थियों के सम्मान समारोहों की परंपरा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। छोटे कस्बों से लेकर महानगरों तक, सामाजिक संस्थाएँ, शैक्षणिक संगठन, राजनीतिक समूह और विभिन्न मंच इन

सफल युवाओं को सम्मानित करने के लिए कार्यक्रम आयोजित करते हैं। भव्य पंडाल, मंच पर सजी कुर्सियाँ, मालाओं और शॉल से सुसज्जित अतिथि, और हर क्षण को कैद करते कैमरे—यह सब मिलकर एक उत्सव जैसा माहौल बनाते हैं। पहली दृष्टि में यह परंपरा अत्यंत सकारात्मक और प्रेरणादायक प्रतीत होती है। आखिरकार, ये वही युवा हैं जिन्होंने वर्षों की कठिन साधना, आत्मसंयम और निरंतर परिश्रम के बल पर देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में सफलता प्राप्त की है।
ऐसे समारोहों का मूल उद्देश्य समाज में प्रेरणा का संचार करना होना चाहिए—विशेषकर उन युवाओं के बीच, जो अपने सपनों को साकार करने के लिए संघर्षरत हैं। जब कोई छात्र किसी सफल अभ्यर्थी को मंच पर सम्मानित होते देखता है, तो उसके भीतर भी एक उम्मीद जन्म लेती है कि वह भी एक दिन इस मुकाम तक पहुँच सकता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो ये कार्यक्रम समाज में सकारात्मक ऊर्जा भरने का माध्यम बन सकते हैं।
किन्तु, इस उजले पक्ष के समानांतर एक ऐसा पहलू भी उभरकर सामने आ रहा है, जिस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। धीरे-धीरे इन समारोहों का स्वरूप बदलता हुआ प्रतीत हो रहा है। कई स्थानों पर यह सम्मान समारोह केवल “प्रतिभा का उत्सव” न रहकर “संबंधों का प्रदर्शन” और “सामाजिक-राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन” बनते जा रहे हैं। मंच पर जितनी चर्चा चयनित अभ्यर्थियों की होनी चाहिए, उससे कहीं अधिक चर्चा आयोजकों, मुख्य अतिथियों और उनके प्रभाव क्षेत्र की होने लगती है।
यह प्रवृत्ति न केवल इन आयोजनों के मूल उद्देश्य को कमजोर करती है, बल्कि समाज में एक गलत संदेश भी प्रसारित करती है—कि सफलता केवल परिश्रम और योग्यता का परिणाम नहीं, बल्कि संबंधों और पहुँच का भी खेल है। यह धारणा उन लाखों युवाओं के मनोबल को प्रभावित कर सकती है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या हम केवल उन लोगों का सम्मान कर रहे हैं जो सफलता की अंतिम सीढ़ी तक पहुँच चुके हैं, या उन लोगों की भी परवाह कर रहे हैं जो उस सीढ़ी पर चढ़ने की कोशिश में संघर्ष कर रहे हैं?
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में आज भी लाखों ऐसे विद्यार्थी हैं, जो प्रतिभा से भरपूर हैं, परंतु संसाधनों की कमी के कारण अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाते। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों में रहने वाले छात्र अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करते हैं। उनके पास गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साधन नहीं होते, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उचित मार्गदर्शन का अभाव होता है, और आर्थिक सीमाएँ उन्हें अपने सपनों से समझौता करने के लिए मजबूर कर देती हैं।
ऐसे छात्र न तो किसी सम्मान समारोह का हिस्सा बन पाते हैं, और न ही उनके संघर्ष की कहानी कहीं सुनाई देती है। वे चुपचाप अपनी परिस्थितियों से जूझते रहते हैं—कभी खेतों में काम करते हुए, कभी छोटे-मोटे रोजगार के साथ पढ़ाई करते हुए, तो कभी बिना किसी कोचिंग या मार्गदर्शन के स्वयं ही रास्ता खोजते हुए। उनके भीतर भी वही जज़्बा, वही क्षमता और वही सपने होते हैं, जो किसी चयनित अभ्यर्थी के भीतर होते हैं—फर्क केवल इतना है कि उन्हें अवसर और संसाधन समान रूप से उपलब्ध नहीं हो पाते।
इस संदर्भ में यह आवश्यक हो जाता है कि हम “सम्मान” की परिभाषा को पुनः परिभाषित करें। क्या सम्मान केवल सफलता का उत्सव है, या वह संघर्ष की पहचान भी है? यदि सम्मान केवल उपलब्धि तक सीमित रह जाता है, तो वह अधूरा है। वास्तविक सम्मान वह है, जो उस यात्रा को भी स्वीकार करे, जो सफलता तक पहुँचने से पहले तय की जाती है—और उन कदमों को भी सराहे, जो अभी उस यात्रा पर हैं।
यदि इन सम्मान समारोहों को वास्तव में सार्थक बनाना है, तो उन्हें केवल औपचारिक आयोजन से आगे बढ़ाकर सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाना होगा। इसके लिए कुछ ठोस पहलें आवश्यक हैं।
सबसे पहले, चयनित अभ्यर्थियों को केवल सम्मानित करने तक सीमित न रखकर उन्हें “मार्गदर्शक” की भूमिका में स्थापित किया जाना चाहिए। यदि हर चयनित अभ्यर्थी कुछ छात्रों का मार्गदर्शन करने का संकल्प ले, तो यह एक बड़ी सामाजिक शक्ति बन सकती है। उनके अनुभव, उनकी रणनीतियाँ और उनका दृष्टिकोण उन छात्रों के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं, जो अभी इस यात्रा की शुरुआत कर रहे हैं।
दूसरा, ऐसे आयोजनों के साथ मेंटरशिप प्रोग्राम, निःशुल्क कोचिंग, पुस्तक बैंक और छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं को जोड़ा जाना चाहिए। केवल मंच पर सम्मान देना पर्याप्त नहीं है; आवश्यक यह है कि उस सम्मान को समाज के लिए उपयोगी परिणामों में बदला जाए। यदि एक सम्मान समारोह से दस जरूरतमंद छात्रों को सही दिशा और संसाधन मिल जाएँ, तो उसकी वास्तविक सार्थकता सिद्ध हो सकती है।
तीसरा, आयोजनों में केवल सफल अभ्यर्थियों को ही नहीं, बल्कि संघर्षरत छात्रों को भी स्थान दिया जाना चाहिए। ऐसे छात्रों को मंच पर बुलाकर उनके प्रयासों की सराहना करना, उनकी कहानियाँ साझा करना और उन्हें प्रोत्साहित करना समाज में एक सकारात्मक संदेश देगा—कि प्रयास भी सम्मान के योग्य है, भले ही परिणाम अभी न मिला हो।
चौथा, इन आयोजनों को दिखावे और भव्यता से मुक्त कर सादगी और सार्थकता की ओर ले जाना होगा। अत्यधिक खर्च, अनावश्यक तामझाम और औपचारिक भाषणों के स्थान पर सार्थक संवाद, अनुभवों का आदान-प्रदान और वास्तविक समस्याओं पर चर्चा अधिक प्रभावी हो सकती है।
इसके साथ ही समाज के विभिन्न वर्गों—शिक्षकों, अभिभावकों, सामाजिक संगठनों और प्रशासन—को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। केवल सरकार या किसी एक संस्था के भरोसे परिवर्तन संभव नहीं है। यह एक सामूहिक प्रयास होना चाहिए, जिसमें हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दे।
मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यदि मीडिया केवल भव्य आयोजनों और बड़ी हस्तियों को ही प्रमुखता देता रहेगा, तो संघर्षरत प्रतिभाओं की कहानियाँ सामने नहीं आ पाएँगी। आवश्यकता इस बात की है कि उन अनसुने चेहरों को भी मंच दिया जाए, जो विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानते।
अंततः, यह समझना आवश्यक है कि समाज की वास्तविक शक्ति केवल उसकी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता में निहित होती है। एक ऐसा समाज, जो केवल सफल लोगों का जश्न मनाता है, वह अधूरा है। पूर्ण समाज वह है, जो अपने संघर्षरत सदस्यों को भी पहचानता है, उनका हाथ थामता है और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देता है।
सम्मान का अर्थ केवल तालियों की गूंज नहीं होना चाहिए; वह एक जिम्मेदारी का संकेत भी होना चाहिए—जिम्मेदारी उस समाज के प्रति, जिसने हमें आगे बढ़ने का अवसर दिया। यदि सम्मान समारोह इस जिम्मेदारी को समझने और निभाने का माध्यम बन जाएँ, तो वे वास्तव में परिवर्तनकारी हो सकते हैं।
अन्यथा, वे केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएँगे—जहाँ मंच तो सजेगा, तालियाँ भी बजेंगी, लेकिन असली बदलाव कहीं पीछे छूट जाएगा।
इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वयं से यह प्रश्न पूछें—क्या हम केवल सफलता का उत्सव मना रहे हैं, या एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ हर प्रतिभा को अवसर मिल सके?
जब तक इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से नहीं दिया जाएगा, तब तक “प्रतिभा सम्मान” और “संबंध प्रदर्शन” के बीच की रेखा धुंधली बनी रहेगी।
और शायद तब तक, असली प्रतिभाएँ अपने अवसर का इंतजार करती रहेंगी—बिना किसी मंच, बिना किसी सम्मान, लेकिन पूरे आत्मविश्वास और संघर्ष के साथ।
डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,
