रविवारीय- “कौन बनेगा करोड़पति” के बच्चे पर बवाल क्यों? मासूमियत को गलत मत समझिए

कौन बनेगा करोड़पति” के बच्चे पर इतना शोर क्यों?

अभी एक घटना सोशल मीडिया की सुर्खियों में छाई हुई है। हालांकि इसे “ख़बर” कहना शायद ठीक नहीं होगा, परंतु चर्चा इतनी हो रही है कि नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। बच्चों के लिए शुरू किए गए कौन बनेगा करोड़पति के एक एपिसोड में एक बाल

मनीश वर्मा, लेखक और विचारक

प्रतिभागी ने, जैसा कि कहा जा रहा है, हमारे सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ “बदतमीजी” से बातें कीं। बस, यही छोटी-सी बात तिल का ताड़ बन गई।

सोशल मीडिया पर उस वाक़िए की क्लिपिंग्स धड़ाधड़ वायरल हो रही हैं। कुछ लोग बच्चे को बदतमीज़ कह रहे हैं, तो कुछ उसकी मासूमियत का बचाव कर रहे हैं। फेसबुक, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम—हर जगह लोग अपनी-अपनी राय दे रहे हैं, अपने-अपने अंदाज़ में ज्ञान बांच रहे हैं। हर कोई जैसे किसी अदालत में जज बन बैठा है।

मैंने भी वह क्लिपिंग देखी। और सच कहूं तो मेरे व्यक्तिगत विचार में उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे लेकर इतना बवाल मचाया जाए। जहाँ तक “बदतमीजी” का सवाल है, मुझे नहीं लगता कि बच्चे का व्यवहार बच्चन जी के प्रति असम्मानजनक था। उसकी हरकतें एक दस साल के बच्चे की स्वाभाविक चंचलता , मासूमियत और आत्मविश्वास की झलक भर थीं। और सबसे सुंदर बात यह रही कि हमारे महानायक ने भी पूरे संयम, सहजता और स्नेह से उस स्थिति को संभाला।

बदतमीजी तब होती है जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी का अनादर करे, या अपने शब्दों में जानबूझकर तल्ख़ी लाए। यहाँ वैसा कुछ नहीं था। हाँ, यह ज़रूर कहा जा सकता है कि बच्चा थोड़ा अतिआत्मविश्वास का शिकार था—जो इस उम्र में स्वाभाविक है। आज के बच्चे वैसे भी हमारे बचपन की तुलना में अधिक जागरूक, अभिव्यक्तिशील और तकनीकी रूप से सक्षम हैं। सोशल मीडिया, यूट्यूब और तमाम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ने उनकी दुनिया को कहीं अधिक बड़ा बना दिया है। ज्ञान के दरवाज़े बिल्कुल खुल से गए हैं।

अगर फिर भी किसी को दोष देना है, तो शायद वह बच्चे के माता-पिता पर ठहरता है—क्योंकि लाड़-प्यार में उन्होंने उसे ज़रूरत से ज़्यादा स्वतंत्रता दी होगी। बच्चों को सिखाना पड़ता है कि बड़े-बुजुर्गों या बाहरी लोगों से कैसे बात करनी चाहिए, क्या सीमा रखनी चाहिए। बच्चे गीली मिट्टी की लोंदे की तरह होते हैं—उन्हें एक अच्छे कुम्हार की ज़रूरत होती है, जो उन्हें सही दिशा और आकार दे सके।

पर अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस बात पर इतनी लंबी बहस वाजिब है? क्या हमें सोशल मीडिया पर किसी बच्चे को कठघरे में खड़ा करना चाहिए? थोड़ा ठहरकर बच्चे और उसके माता-पिता की स्थिति पर भी सोचिए। उस दस साल के मासूम पर क्या बीत रही होगी, यह कल्पना कीजिए।

कृपया उसे “अपराधी” न बनाइए—वह सिर्फ़ एक बच्चा है, जिसने कुछ ज़्यादा आत्मविश्वास से, लेकिन मासूमियत के साथ बातें कीं।

आइए, सोशल मीडिया पर हो रही बेमानी बहस बंद करें।

बच्चों को थोड़ा प्यार, थोड़ी समझ और थोड़ी माफ़ी की ज़रूरत होती है—न कि कठोर निर्णयों की।

मनीष वर्मा “मनु”

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