रविवारीय- “चरित्र बनाम भाग्य: कहावत के पीछे का सच और समाज की सच्चाई”

“औरत का चरित्र और मर्द का भाग्य…” – एक सामाजिक विमर्श

“त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम; देवो न जानाति कुतो मनुष्यः”

लोगों के मुंह से अक्सर यह सुना जाता है – “औरत का चरित्र और मर्द का भाग्य, इसके बारे में भगवान भी नहीं बता सकते, तो इंसान

मनीश वर्मा, लेखक और विचारक

की क्या बिसात?” यह बात सुनने में जितनी तीखी लगती है, उसके पीछे का भाव कहीं अधिक गहराई लिए हुए है। पहली दृष्टि में यह महिलाओं के प्रति नकारात्मक भाव लिए प्रतीत होती है, लेकिन अगर इसे सतही भावनाओं से इतर समझा जाए, तो शायद यह मानवीय स्वभाव की अनिश्चितता और जीवन की अप्रत्याशितता को दर्शाती है।

दरअसल, किसी महिला का ‘चरित्र’ समय, परिस्थिति और भूमिका पर निर्भर करता है – वह एक बेटी हो सकती है, बहन हो सकती है, पत्नी, माँ या एक स्वतंत्र स्त्री भी। हर भूमिका की अपनी सीमाएँ, अपेक्षाएँ और संघर्ष होते हैं। इसी तरह ‘पुरुष का भाग्य’ भी कई बार उसके कर्म और संयोगों पर आधारित होता है। पर पितृसत्तात्मक समाज में इस कहावत की व्याख्या अक्सर गलत तरीके से की गई है – महिलाओं के चरित्र को संदेह की निगाह से देखा गया और पुरुष के भाग्य को सहानुभूति के चश्मे से।

समाज में आज जो बदलाव देखने को मिल रहे हैं, वे रिश्तों के ताने-बाने को चुनौती दे रहे हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल संपर्कों की बाढ़ ने भावनाओं को कहीं न कहीं सतही बना दिया है। शादी जैसे पवित्र रिश्ते भी अब संदिग्ध होते जा रहे हैं, खासकर जब अवैध संबंधों के कारण परिवार टूटने लगे हों, परस्पर विश्वास ख़त्म हो रहा है और जाने जा रही हैं ।

हाल के दिनों में कई चौंकाने वाली घटनाएँ सामने आई हैं। चाहे मेरठ की मुस्कान का मामला हो, या हनीमून के ठीक बाद युवक की हत्या – इन घटनाओं ने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सवाल उठता है – आखिर ऐसी घटनाओं की जड़ में क्या है? क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर लिए गए गलत निर्णय हैं, या इसके पीछे कोई गहरी सामाजिक बीमारी है?
एक बात मुझे बार-बार कौंधती है, मुझे सोचने पर मजबूर करती है- आख़िर क्या मिला आपको? एक साथ कितनी ज़िंदगियाँ बर्बाद हुई । जान लेने की आपमें हिम्मत थी तो अपने संबंध के लिए परिवार और समाज से भिड़ जाते । नाहक जान चली गई ।

महिलाएं, जिन्हें हमारी संस्कृति में ‘करुणा की मूर्ति’ और ‘सहनशीलता की प्रतीक’ माना गया है, जब किसी की जान लेने पर उतारू हो जाती हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति की विफलता नहीं होती, यह पूरे समाज के लिए चेतावनी होती है।

इस तरह की घटनाओं को केवल कानून के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। कानून अपराध के बाद सजा देता है, पर सामाजिक संबंधों में आई गिरावट को नहीं सुधार सकता। रिश्तों की गरिमा, विश्वास और नैतिकता – ये सब चीजें परिवार, समाज और शिक्षा से आती हैं। आज जरूरत है कि हम घरों में, परिवारों में, स्कूलों में और मीडिया में ऐसी चर्चा को जगह दें जहाँ संबंधों की मर्यादा, परस्पर विश्वास और आत्म-संयम की बात की जाए।

परिवार के बुज़ुर्ग, जिनके पास अनुभव का खजाना है, उन्हें भी अब मूकदर्शक बनकर नहीं बैठना चाहिए। उन्हें संवाद के ज़रिए युवाओं से जुड़ना होगा, उन्हें समझाना होगा कि जीवन सिर्फ भावनाओं के वेग में बह जाने का नाम नहीं, बल्कि संयम, समझदारी और ज़िम्मेदारी का दूसरा नाम है।

आज हमें यह मानना होगा कि हम एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं, जहाँ पुराने मूल्य और नई सोच के बीच टकराव चल रहा है। इस दौर में केवल कानून, तकनीक या भय से चीजें नहीं बदलेंगी। समाज को आत्ममंथन करना होगा। महिलाओं को भी अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों की गहराई को समझना होगा। और पुरुषों को भी भाग्य के भरोसे बैठने की बजाय रिश्तों में संवाद और विश्वास की भूमिका को पहचानना होगा।

अगर हम सचमुच एक बेहतर समाज चाहते हैं, तो रिश्तों को उपभोग नहीं, उत्तरदायित्व की दृष्टि से देखना होगा। वरना ऐसे हादसे बार-बार होंगे और हम सिर्फ ‘क्यों हुआ’ पूछते रह जाएंगे, ‘कैसे रुके’ इस पर कोई चर्चा नहीं होगी।

मनीश वर्मा “ मनु “

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