“आज जाने की ज़िद ना करो ।
यूँ ही पहलू में बैठे रहो ॥”
फ़ैयाज़ हाशमी द्वारा लिखी गई एक बेहतरीन और लोकप्रिय गीत है । इसके बोल बड़े ही ख़ूबसूरत और सारगर्भित हैं । इसे सबसे पहले हबीब वली मोहम्मद ने लोकप्रिय बनाया । बाद में प्रख्यात ग़ज़ल

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
गायिका फ़रीदा खानम ने इस ग़ज़ल को 1993 में इसे टी वी पर गाया और उसके बाद उन्होंने इसे अपने बहुत सारे लाइव कंसर्ट में प्रस्तुत किया । इसकी मधुर धुन और बेहद रोमांटिक और दिल को छू लेने वाले बोलों की वजह से कई लोगों ने अपनी आवाज़ दी और इसे वैश्विक मंच पर लोकप्रिय बनाया ।
ख़ैर ! कारण बहुतेरे हो सकते हैं कहीं से कहीं ना जाने को । वैसे बात कहीं और जानी थी और कहीं और चली गई । लेकिन शायद यही तो इस गीत की ख़ूबसूरती है कि इसे सुनते-सुनते मन अपने ही किसी कोने में चला जाता है, जहाँ कुछ पल ठहर जाने का मन करता है ।
जाड़े की अलसाई सुबह हो और आप बिस्तर पर गर्माहट के साथ पड़े हुए हैं या फिर बाहर बारिश हो रही हो, जिसकी पड़ती हुई बूँदें बिल्कुल ही घुँघरुओं सी बजती हुई बेहद ही ख़ूबसूरत और रोमांटिक पलों का अहसास दिला रही हों, तो किसे भला घर से निकल कार्यालय जाने का मन करेगा । चलो एक दिन बॉस की नाराज़गी झेल ली जाए, पर आज तो कम से कम इस पल का आनंद अपनी बालकनी में अपनों के साथ सुकून के साथ बैठकर उठाया जाए । वर्तमान में जीना ही ज़िंदगी है ।
कभी-कभी वाक़ई मन होता है, छोड़ो यार, आज ऑफिस नहीं जाना है । मूड नहीं है । कभी कभार ऐसा होता था, कार्यालय को निकल रहे होते थे और बच्चे ने रोते हुए ज़िद पकड़ ली । तब भाई साहब, वाकई बहुत तकलीफ़ हुआ करती थी । बड़ी ही असमंजस वाली स्थिति होती थी । किस-किस को समझाएँ । तब ना चाहते हुए भी मन को समझाना पड़ता है—भाई, दाल रोटी का सवाल है । मन को मारते हुए, सब कुछ किनारे रख चल दिए कार्यालय ।
यहाँ हम अपनी बात नहीं कर रहे हैं । हमारे जैसे कई लोग इस ब्रह्मांड में मौजूद हैं, तभी तो अभी-अभी कहीं मैंने पढ़ा कि किसी जगह पर किसी कंपनी ने अपने कर्मचारियों को यह छूट दी कि आप महीने में किसी एक दिन, जब आपका मन ना करे, तब सिमपली अपने कार्यालय को सूचित करें कि आपका आज कार्यालय आने का “मूड” नहीं है और आप नहीं आ रहे हैं । इस “मूडवाली” छुट्टी को कहीं आपको कोई एक्सप्लेन करने की ज़रूरत भी नहीं है । आपकी छुट्टी नामंज़ूर भी नहीं की जाएगी । जरा सोचिए, कितनी अच्छी व्यवस्था है । काश ! यह सुख हमें भी प्राप्त हो ।
हालाँकि छुट्टी चाहे एक दिन की हो, लेकिन उस एक दिन में आदमी अपने भीतर के थके हुए आदमी से मिल सकता है । कभी बिना किसी काम के चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बालकनी में बैठना, कभी पुरानी यादों की गलियों में टहलना और कभी अपनों के साथ यूँ ही दो बातें कर लेना—शायद यही वे छोटे-छोटे सुख हैं, जिन्हें नौकरी की आपाधापी में हम अक्सर पीछे छोड़ आते हैं ।
अब तो पाँव भी कब्र में लटका हुआ है । चल चलने की बेला है । नौकरी निभाने की क़वायद चल रही है । नौकरी की शुरुआत में ही मेरी माँ ने मुझे कहा था—कैसे करोगे तुम नौकरी । तुम तो लंबे वक्त तक बैठ भी नहीं सकते हो । तब वाकई लगा था कैसे निभेगी यह मुआ नौकरी, पर यह दाल रोटी जो ना करा दे । देखते ही देखते तीस साल से ऊपर का वक़्त निकल गया और लगता है जैसे कल ही की बात है । पर अब “मूड नहीं है” वाली छुट्टी की तलब ज़्यादा हो रही है ।
शायद उम्र के इस पड़ाव पर आकर समझ में आता है कि छुट्टी सिर्फ कार्यालय से नहीं चाहिए होती, कभी-कभी ज़िंदगी की लगातार भागदौड़ से भी छुट्टी चाहिए होती है । कुछ देर के लिए घड़ी को रोक देने का मन करता है । कोई लक्ष्य नहीं, कोई जल्दी नहीं, कोई फाइल नहीं, कोई फोन नहीं—बस अपने होने का एहसास और अपने लोगों के साथ बिताए हुए कुछ सुकून के पल ।
और फिर मन कहीं कह उठता है—
आज जाने की ज़िद ना करो, यूँ ही पहलू में बैठे रहो
शायद यही कुछ पल बाद में हमारी सबसे ख़ूबसूरत यादें बन जाएँगे ।
“उजाले अपनी यादों को हमारे साथ रहने दो
ना जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए”
मनीष वर्मा “मनु”
