रविवारीय- जब ‘गुंडा’ था सम्मान, संरक्षण और वच, का प्रतीक, आज बन गया डर और अराजकता का पर्याय

वो एक गुंडा ही तो था , जिसने गुंडा शब्द को इज़्ज़त दिलाई । गुंडा एक किरदार बन पाया । वो कोई ऐरा गैरा, नत्थू – खैरा सड़क छाप लीचड नहीं था ! ना ही कोई लफ़ंगा था । वो ज़मींदार घराने से

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

ताल्लुक़ रखता था । ज़मींदारी ठुकरा कर आया था वो । किसी की इज़्ज़त, स्वाभिमान, सम्मान और आत्मसम्मान के क्या मायने होते हैं उसे बखूबी मालूम था । ना अन्याय करना और ना सहना, धर्म था उसका । ‘ जयशंकर प्रसाद ‘ का ‘गुंडा था वो ।
उस दौर में सड़कें गर महफ़ूज़ थीं, मुहल्ले की गलियाँ और चाहरदिवारी गर महफ़ूज़ थीं, लोगों का सम्मान गर बचा था और बचा था उसके इलाक़े में रहने वाली आधी आबादी का सम्मान और आत्मसम्मान तो फिर गुंडा शब्द से परहेज क्यों । समाज जिस तबके को इज़्ज़त की निगाह से नहीं देखता था, जिनकी इज़्ज़त सरेआम नीलाम थी गर उनके बीच भी वो इज़्ज़त का पात्र था तो फिर उसकी शख़्सियत से परहेज क्यों ?
एक दौर था वो जब ऐसे लोग समाज की विडंबनाओं से जन्म लेते थे और उन्हीं विडंबनाओं के बीच संतुलन साधते थे । समाज के भीतर रहते हुए समाज के साथ उनका संघर्ष चलता रहता था ।
खैर । बहुत महत्वाकांक्षी नहीं था वो और न ही समाज से उसकी बहुत ज़्यादा उम्मीदें थीं । उसके अपने अंतर्निहित अंतर्द्वंद्व थे । अपनी धुन और अपनों के बीच रहता था वो । उसके साथी उसके एक इशारे पर जान छिड़कते थे । क्योंकि वह उन सभी के लिए सिर्फ और सिर्फ़ उस्ताद नहीं बल्कि भरोसे का दूसरा नाम था ।लोग उसकी इज़्ज़त करें या ना करें, पर लोगों की इज़्ज़त उसकी वजह से ज़रूर महफ़ूज़ रहती थी । निहत्थों की मदद करना और मरते दम तक अपना वचन निभाना जिसका धर्म हो ऐसे गुंडे से भला किसे परहेज़ हो सकता है ।
अब तस्वीरें बदल सी गई हैं । एक दौर था वो । वक़्त बदला, लोग बदले, समाज ने हौले से समय के साथ ही साथ हौले से एक अँगड़ाई ली । इस अँगड़ाई में कई चेहरे के चाल और चरित्र, बहुत सारे अर्थ और ढेरों परिभाषाएँ पीछे छूट सी गईं हैं । समय बदला, समाज बदला और बदल गए इस शब्द के मायने और चाल चरित्र । पहले जहाँ यह शब्द दबंगई के साथ ही साथ संरक्षण, वचन और मर्यादा का बोध कराता था , अब वही आज इस शब्द का संबंध सिर्फ और सिर्फ़ डर, लालच और अराजकता है । अब ना तो वह उसूल बचा है और ना ही ईमान और ना ही लोकधर्म, आत्मसम्मान और स्वाभिमान । आज गुंडा शब्द से दुनिया पटी पड़ी है, पर आज कोई ननहकू सिंह नहीं है । जी हाँ वही ननहकू सिंह जिसके चरित्र को गढ़ते हुए शायद जयशंकर प्रसाद जी ने एक पल भी नहीं सोचा होगा कि वो गुंडा शब्द को महिमामंडित करने जा रहे हैं । उन्होंने तो उस काल खंड की सामाजिक व्यवस्था को देखते हुए एक ऐसे किरदार को जन्म दिया जो असहाय और कमजोरों का सहारा बन सके, उनकी आवाज़ बन सके । अब तो हर गली मोहल्ले, चौक-चौराहों पर आपको अनगिनत गुंडे और उनकी गुंडागर्दी की कहानियाँ सुनने को मिलेंगी, पर कोई ‘ गुंडा ‘ नहीं मिलेगा जो बेसहारा , असहाय और कमज़ोर लोगों की आवाज़ बन सके । गुंडा शब्द से भी भारी भरकम शब्द वर्तमान में प्रचलित हैं । माफिया, बाहुबली और ना जाने क्या-क्या, पर इनमें वो बात नहीं जो ‘ गुंडा ‘ में थी । वो लोगों के बीच भरोसा कहाँ से लाएंगे । कहाँ से आएगा वो जज़्बात वो अनुभूति जो लोगों को निकट ला सके ।

मनीष वर्मा “मनु”

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