पटना। बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद जातीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। नई कैबिनेट में विभिन्न वर्गों और सहयोगी दलों को जगह दी गई, लेकिन कायस्थ समाज से किसी भी नेता को मंत्रिपरिषद में स्थान नहीं मिलने पर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
सामाजिक संतुलन को लेकर उठ रहे सवाल
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बिहार की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय और प्रशासनिक तथा शैक्षणिक क्षेत्रों में मजबूत उपस्थिति रखने वाले कायस्थ समाज की अनदेखी से असंतोष बढ़ सकता है। कई सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों ने इसे सामाजिक संतुलन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है।
विभिन्न दलों को मिला प्रतिनिधित्व
नई कैबिनेट में भाजपा, जदयू तथा अन्य सहयोगी दलों के नेताओं को शामिल किया गया है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया का इंतजार
हालांकि सरकार या गठबंधन दलों की ओर से इस मुद्दे पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जारी है कि आने वाले दिनों में सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए मंत्रिमंडल में और बदलाव या विस्तार संभव हो सकता है।
कायस्थ संगठनों में नाराजगी
पिछली कैबिनेट में एकमात्र कायस्थ मंत्री नितिन नवीन को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद से हीं बिहार मंत्रिपरिषद में कायस्थों का प्रतिनिधित्व शून्य हो गया था। उम्मीद थी कि इस बार कायस्थ समाज के किसी प्रतिनिधि को हिस्सेदारी जरूर मिलेगी। अब देखना है कि ये समाज जो बीजेपी के कोर वोटर हैं उसे बीजेपी कैसे मैनेज करेगी।
