बाल श्रम की व्यथा और कठोर श्रम करते हाथ मूल सुविधाओं से वंचित।

(1 मई ,अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष)

 अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1 मई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस केवल श्रमिकों के सम्मान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उन

संजीव ठाकुर

असंख्य अदृश्य हाथों की पीड़ा को भी सामने लाता है जो आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं। भारत जैसे विकासशील देश में यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ श्रम के साथ-साथ बाल श्रम की समस्या भी एक गहरी सामाजिक विडंबना के रूप में उपस्थित है। संविधान और कानूनों के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों से खतरनाक उद्योगों, कारखानों, होटलों, ढाबों या अन्य वाणिज्यिक गतिविधियों में कार्य कराना अपराध है। इसके बावजूद वास्तविकता यह है कि देश के छोटे-बड़े शहरों, कस्बों और गांवों में लाखों बच्चे आज भी श्रम के बोझ तले दबे हुए हैं। वे कभी चाय की दुकानों पर काम करते दिखते हैं, कभी पटाखा उद्योगों में, तो कभी कचरा बीनते या भीख मांगते हुए। यह केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि उनके बचपन, शिक्षा और भविष्य का भी हनन है।

बाल श्रम की जड़ें गहरी हैं।

       गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा और सामाजिक जागरूकता का अभाव इसके प्रमुख कारण हैं। कई परिवारों में आर्थिक मजबूरी इतनी तीव्र होती है कि वे स्वयं अपने बच्चों को श्रम के दलदल में धकेल देते हैं। इसके अतिरिक्त अभिभावकों की असामयिक मृत्यु, बीमारी या परिवार में अधिक सदस्यों का होना भी बच्चों को समय से पहले जिम्मेदारियों के बोझ तले ला देता है।

बाल श्रमिकों का शोषण बहुआयामी होता है शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक। उन्हें वयस्क श्रमिकों की तुलना में बहुत कम पारिश्रमिक दिया जाता है, जिससे नियोजकों के लिए वे सस्ते और सुविधाजनक श्रम का स्रोत बन जाते हैं। यही कारण है कि बाल श्रम की प्रवृत्ति समाप्त होने के बजाय कई स्थानों पर बढ़ती दिखाई देती है।

इस समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार ने कई महत्वपूर्ण कानून और योजनाएँ लागू की हैं, जैसे बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, तथा राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना। इसके साथ ही भारत सरकार द्वारा पोषण, शिक्षा और बाल संरक्षण से जुड़ी अनेक योजनाएँ संचालित की जा रही हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और यूनिसेफ जैसे संगठन बाल श्रम उन्मूलन के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के कन्वेंशन 138 और 182 विशेष रूप से बाल श्रम के उन्मूलन और खतरनाक कार्यों से बच्चों को मुक्त कराने पर केंद्रित हैं। फिर भी, समस्या का समाधान केवल कानून बनाने से नहीं होगा, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से ही संभव है। दुर्भाग्यवश, कई बार इन कानूनों का पालन कराने वाली एजेंसियाँ भ्रष्टाचार, लापरवाही और लालफीताशाही की शिकार हो जाती हैं। परिणामस्वरूप, नियोजक आसानी से बच निकलते हैं और बच्चे शोषण की आग में झोंक दिए जाते हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि बाल श्रम केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक और नैतिक प्रश्न भी है। जब तक समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता नहीं बढ़ेगी, जब तक हम बच्चों को श्रम नहीं बल्कि शिक्षा और संस्कार का अधिकार देने के लिए प्रतिबद्ध नहीं होंगे, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।

मजदूर वर्ग की व्यापक स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिक आज भी न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षित कार्यस्थल जैसे मूल अधिकारों से वंचित हैं। प्रवासी मजदूरों की स्थिति, विशेषकर महामारी के समय, ने इस सच्चाई को उजागर कर दिया कि श्रमिक वर्ग हमारे विकास का आधार होने के बावजूद सबसे अधिक उपेक्षित है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि बाल श्रम और श्रमिक शोषण के विरुद्ध एक समन्वित और सख्त नीति अपनाई जाए। इसके लिए कानूनों का कठोर और पारदर्शी क्रियान्वयन,शिक्षा और पोषण योजनाओं का प्रभावी विस्तार,

गरीब परिवारों के लिए आर्थिक सुरक्षा, समाज में जागरूकता का प्रसार अत्यंत आवश्यक है।

यदि हम सचमुच एक सशक्त और विकसित राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें अपने बच्चों को श्रम की बेड़ियों से मुक्त कर शिक्षा और अवसरों की मुख्यधारा में लाना होगा। अन्यथा, आज का यह बाल श्रमिक कल का कमजोर नागरिक बनेगा, और एक सुदृढ़ राष्ट्र का सपना अधूरा ही रह जाएगा।

संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार,चिंतक, लेखक, स्तंभकार,रायपुर, छत्तीसगढ़,

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