गानों के बहाने गिरता स्तर या समाज का आईना?

सेंसर, सिनेमा और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी पर एक विचार

डॉ. सत्यवान सौरभ

आज के दौर में संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि वह समाज की सोच, दिशा और संस्कारों को प्रभावित करने वाली एक सशक्त शक्ति बन चुका है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और

डाॅ.सत्यवान सौरभ

सोशल मीडिया ने संगीत की पहुँच को इतना व्यापक बना दिया है कि कोई भी गीत कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुँच सकता है। ऐसे में गानों के बोल, उनकी प्रस्तुति और उनके पीछे छिपे संदेश का प्रभाव भी पहले की तुलना में कहीं अधिक गहरा और व्यापक हो गया है।

लेकिन हाल के समय में कुछ गानों की भाषा, उनके संकेत और उनकी दृश्यात्मकता जिस दिशा में बढ़ रही है, वह एक गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। शब्दों के चयन में बढ़ती अशालीनता, दोहरे अर्थों वाले वाक्य और भड़काऊ प्रस्तुतियाँ—ये सब मिलकर यह प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या हम मनोरंजन के नाम पर अपनी सांस्कृतिक मर्यादाओं को धीरे-धीरे समाप्त कर रहे हैं? या फिर यह केवल समय के साथ बदलती अभिव्यक्ति की शैली है, जिसे हमें स्वीकार करना चाहिए?

अक्सर ऐसे मुद्दों पर सबसे पहले उंगली सेंसर व्यवस्था पर उठती है, विशेष रूप से Central Board of Film Certification (सीबीएफसी) पर। लेकिन यह समझना आवश्यक है कि सेंसर बोर्ड की भूमिका सीमित और परिभाषित है। वह मुख्यतः फिल्मों को प्रमाणित करने का कार्य करता है। आज के डिजिटल युग में अधिकांश गाने सीधे यूट्यूब, ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से दर्शकों तक पहुँचते हैं, जहाँ पारंपरिक सेंसरशिप की पकड़ लगभग समाप्त हो चुकी है। ऐसे में सेंसर बोर्ड को हर समस्या का जिम्मेदार ठहराना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि डबल मीनिंग या इशारों में बात कहने की परंपरा भारतीय सिनेमा में नई नहीं है। पुराने दौर के गीतों में भी रूपकों और प्रतीकों का प्रयोग होता था, लेकिन उनमें एक सादगी, एक सौंदर्य और एक मर्यादा होती थी। वे भावों को व्यक्त करते थे, उत्तेजना को नहीं उभारते थे। आज स्थिति यह है कि संकेत इतने स्पष्ट और प्रत्यक्ष हो गए हैं कि वे कल्पना की गुंजाइश कम और भौंडेपन की संभावना अधिक पैदा करते हैं। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानसिकता का भी द्योतक है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि इस बदलाव के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या केवल फिल्म निर्माता, गीतकार और कलाकार ही इसके लिए दोषी हैं? या फिर दर्शक भी इस प्रक्रिया में बराबर के भागीदार हैं? सच तो यह है कि बाजार उसी दिशा में चलता है, जहाँ मांग होती है। जब कोई गीत अपने विवादित या उत्तेजक बोलों के बावजूद करोड़ों बार देखा और सुना जाता है, तो यह केवल निर्माता की रणनीति नहीं, बल्कि दर्शकों की पसंद का भी परिणाम होता है। हम जिस प्रकार के कंटेंट को देखते, सुनते और साझा करते हैं, वही धीरे-धीरे मुख्यधारा बन जाता है।

आज का दर्शक केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि कंटेंट का निर्माता और प्रचारक भी है। सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति किसी गीत को वायरल कर सकता है। ऐसे में जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। यदि हम सच में बेहतर और सार्थक संगीत चाहते हैं, तो हमें अपनी पसंद और प्राथमिकताओं में बदलाव लाना होगा। केवल आलोचना करने से स्थिति नहीं बदलेगी, बल्कि सकारात्मक विकल्पों को समर्थन देना भी आवश्यक है।

सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि इस प्रकार के गानों का प्रभाव बच्चों और युवाओं पर पड़ता है। वे बिना किसी समझ के इन गीतों को गुनगुनाते हैं, उनके शब्दों को दोहराते हैं और अनजाने में ही उन भावों को आत्मसात करने लगते हैं। बचपन और किशोरावस्था वह अवस्था होती है, जहाँ व्यक्ति का मानसिक और नैतिक विकास हो रहा होता है। ऐसे में यदि उनके सामने बार-बार भड़काऊ और भ्रमित करने वाली सामग्री प्रस्तुत की जाती है, तो उसका प्रभाव दीर्घकालिक हो सकता है।

यहाँ यौन शिक्षा के प्रश्न को भी समझना आवश्यक है। यौन शिक्षा एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय है, जिसे वैज्ञानिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण से समझाया जाना चाहिए। लेकिन जब यही विषय गानों के माध्यम से भ्रामक, अशालीन और मनोरंजन के रूप में प्रस्तुत होता है, तो वह शिक्षा नहीं, बल्कि विकृति और भ्रम पैदा करता है। इससे न केवल विषय की गंभीरता कम होती है, बल्कि समाज में गलत धारणाएँ भी पनपती हैं।

समाधान की बात करें तो यह स्पष्ट है कि केवल प्रतिबंध या सेंसरशिप इस समस्या का स्थायी हल नहीं है। इतिहास गवाह है कि अत्यधिक नियंत्रण अक्सर रचनात्मकता को सीमित करता है और वैकल्पिक रास्तों को जन्म देता है। आवश्यकता है संतुलन की—ऐसा संतुलन जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी बनी रहे और सामाजिक जिम्मेदारी भी निभाई जाए।

इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जागरूकता की है। दर्शकों को यह समझना होगा कि वे क्या देख रहे हैं और उसका क्या प्रभाव हो सकता है। अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ संवाद स्थापित करना होगा, उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाना होगा। शिक्षण संस्थानों को भी इस विषय पर खुलकर और जिम्मेदारी के साथ चर्चा करनी चाहिए।

साथ ही, कलाकारों और निर्माताओं को भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझना होगा। कला केवल कमाई का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का साधन भी है। यदि वे चाहें तो मनोरंजन के साथ-साथ सकारात्मक संदेश भी दे सकते हैं। कई ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ गीतों और फिल्मों ने समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का कार्य किया है। आवश्यकता है उस दिशा में प्रयास करने की।

मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की भूमिका भी यहाँ महत्वपूर्ण है। उन्हें केवल लोकप्रियता और मुनाफे के आधार पर कंटेंट को बढ़ावा देने के बजाय उसकी गुणवत्ता और सामाजिक प्रभाव पर भी ध्यान देना चाहिए। यदि वे चाहें तो बेहतर और सार्थक सामग्री को प्रोत्साहित कर सकते हैं।

अंततः, सिनेमा और संगीत समाज का आईना होते हैं। वे वही दिखाते हैं, जो समाज में कहीं न कहीं मौजूद होता है। यदि इस आईने में हमें विकृति दिखाई दे रही है, तो इसका अर्थ यह भी है कि हमें अपने भीतर झाँकने की आवश्यकता है। केवल आईने को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।

इसलिए यह समय केवल आलोचना करने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है। हमें यह तय करना होगा कि हम किस प्रकार के समाज की कल्पना करते हैं और उस दिशा में अपने छोटे-छोटे निर्णयों के माध्यम से योगदान देना होगा। क्योंकि अंततः, समाज वही बनता है, जैसा उसका सामूहिक व्यवहार और सोच होती है।

यदि हम सच में एक संवेदनशील, जागरूक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध समाज चाहते हैं, तो हमें अपने मनोरंजन के साधनों और उनकी दिशा पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं, जब मनोरंजन के नाम पर परोसी जा रही सामग्री हमारे ही मूल्यों को चुनौती देने लगेगी।

 

डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *