सुप्रीम कोर्ट का मानवीय फैसला: जीवन के अंतिम क्षणों में भी गरिमा की रक्षा का मार्ग प्रशस्त

🖋️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

गरिमा के साथ जीवन के अंतिम क्षण॥

11 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने एक ऐसा निर्णय दिया, जिसे कई मायनों में ऐतिहासिक कहा जा सकता है। यह फैसला हमें याद दिलाता है कि जब सर्वोच्च

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

न्यायालय अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करता है, तो उसका असर केवल कानून की किताबों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह आम लोगों के जीवन को भी छूता है। न्याय का ऐसा स्वरूप नागरिकों को आश्वस्त करता है कि कठिन और जटिल परिस्थितियों में भी कोई संस्था है जो मानवीय गरिमा को सर्वोच्च मानती है।
इस तरह के निर्णय लेना आसान नहीं होता। इसमें केवल कानून की व्याख्या भर नहीं होती, बल्कि गहरी मानवीय संवेदना, नैतिक साहस और सामाजिक जिम्मेदारी भी शामिल होती है। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं जिनमें कोई एक व्यक्ति—चाहे वह डॉक्टर हो या परिवार का सदस्य—अपने दम पर निर्णय लेने का साहस नहीं जुटा पाता। ऐसे समय में न्यायपालिका का संतुलित और स्पष्ट मार्गदर्शन समाज के लिए एक दिशा बन जाता है।
11 मार्च का यह फैसला भी कुछ ऐसा ही है। इसे पढ़ना वकीलों और डॉक्टरों—दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण और संतोषजनक अनुभव है, क्योंकि इसमें जीवन बचाने वाले इलाज को रोकने या वापस लेने के मामले में कानूनी स्थिति को स्पष्ट किया गया है।
मामला हरीश राणा का था। हरीश पिछले बारह वर्षों से पूरी तरह अचेत अवस्था में थे। यह केवल एक कानूनी मामला नहीं था, बल्कि एक परिवार की पीड़ा और असहायता की कहानी भी थी। हरीश के परिवार ने अपने बेटे के इलाज में अपना सब कुछ झोंक दिया,हर संभव प्रयास किया, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया जहाँ उनके पास विकल्प बहुत सीमित रह गए थे।
न्यायालय ने इस संवेदनशील स्थिति को समझते हुए इलाज वापस लेने की प्रक्रिया के लिए एक स्पष्ट और व्यवस्थित ढांचा तैयार किया है। इस ढांचे का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे मरीजों को केवल चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के सहारे जीवित रखने के बजाय उन्हें आराम देने वाली देखभाल—जिसे पैलियेटिव केयर कहा जाता है—और जीवन के अंतिम समय में गरिमापूर्ण देखभाल उपलब्ध कराई जाए। यह संतुलन बनाना आसान नहीं था, क्योंकि एक ओर जीवन बचाने की चिकित्सा की मूल भावना है, तो दूसरी ओर मानव गरिमा और अनावश्यक पीड़ा से मुक्ति का प्रश्न।
इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अब इसकी जिम्मेदारी देश की स्वास्थ्य प्रणाली को सौंपी गई है। यानी सरकारों और चिकित्सा संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस व्यवस्था को व्यावहारिक रूप कैसे दिया जाए। अब निजी अस्पताल यह कहकर पीछे नहीं हट सकते कि कानून ने उनके हाथ बांध रखे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस निर्णय को इच्छा मृत्यु के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, जिसे पहले अक्सर पैसिव यूथिनेसिया कहकर गलत तरीके से समझा जाता था। यहाँ मृत्यु “दी” नहीं जाती। बल्कि ऐसी बीमारी, जो पहले से मौजूद है और जिसका उपचार संभव नहीं है, उसे उसके प्राकृतिक क्रम में आगे बढ़ने दिया जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस दौरान मरीज को अकेला नहीं छोड़ा जाता; उसे देखभाल, सहानुभूति और राहत दी जाती है।
इस फैसले में केवल कानून की व्याख्या नहीं है, बल्कि एक गहरी मानवीय दृष्टि भी है। यह हमें याद दिलाता है कि चिकित्सा और कानून दोनों का अंतिम उद्देश्य मनुष्य की गरिमा की रक्षा करना है।
हरीश राणा के संदर्भ में सर्वोच्च अदालत का यह निर्णय आगे चलकर ऐसे अनेक परिवारों के दुख-दर्द को कम करने में मददगार साबित होगा, जो इसी तरह की कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं।
दरअसल, इस फैसले के साथ न्यायपालिका ने एक रास्ता दिखा दिया है। अब असली जिम्मेदारी चिकित्सा जगत और सरकारों की है कि वे इस रास्ते पर आगे बढ़ें और ऐसी व्यवस्था विकसित करें जिसमें मानव जीवन के अंतिम क्षण भी गरिमा, संवेदना और देखभाल के साथ बीत सकें।
फ़ैसले से पूर्व सुनवाई के दौरान दोनों न्यायाधीश इस बात से पूरी तरह अवगत थे कि यह मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए उन्होंने अपने शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी और सोच-समझकर किया।
सुनवाई के दौरान उन्होंने परिवार के साथ बातचीत में पूरी संवेदनशीलता दिखाई। साथ ही दोनों पक्षों के वकीलों के प्रति सम्मान प्रकट किया। सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि उन्होंने कानूनी प्रश्नों को गहरी समझ, गंभीरता और विचारों की स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया।
अब जबकि सर्वोच्च अदालत ने अपना फ़ैसला सुना दिया है और गेंद अब दूसरे पाले में आ गई है । अब देखना यह है कि मानव जीवन के अंतिम क्षणों में हम क्या बेहतर कर सकते हैं।

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