रविवारीय- किलकारियों से सन्नाटे तक, ज़िंदगी के बदलते पड़ावों की कहानी

🖋️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

ज़िंदगी का सफ़र

अरसे बाद घर में बच्चे की किलकारियाँ गूँजी थीं। घर में लक्ष्मी का आगमन हुआ था ।लड़की ने जन्म लिया था। अब पहले जैसी बात नहीं रही । लड़के और लड़कियों में कोई फर्क नहीं रहा। पर हां कभी कभार कुछेक घटनाएँ ऐसी हो जाती हैं कि मन खिन्न हो

🖋️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

जाता है ।
सभी लोग बहुत ख़ुश थे। आख़िर ख़ुश क्यों न हों—सुमित के बाद घर में किसी बच्चे का जन्म जो हुआ था। सुमित की शादी को लगभग दस साल होने को आए थे, पर यह जो नई पीढ़ी है ना, इनके लिए इनका अपना करियर पहले आता है। चारों ओर से व्यवस्थित और सुरक्षित होने के बाद ही ये परिवार बढ़ाने का फ़ैसला लेते हैं।
सुमित और आर्या की शादी के बाद से ही सपना ने अपने सपने संजो रखे थे—कभी पोती के पैरों में बजती पायलों की रुनझुन तो कभी उसकी छोटी सी कलाइयों की चूड़ियों की खनक तो कभी उसके बालों में गूँथी जाने वाली चोटियों की कल्पना। पर उसकी सुनता कौन था। आज वह सुबह से ही भागदौड़ में लगी थी, चेहरे पर थकान के साथ ही साथ एक अजीब-सी संतुष्टि भी थी—बरसों की प्रतीक्षा जो पूरी हुई थी। उसके सपने साकार हो उठे थे ।
घर में सभी बहुत ख़ुश थे। पास-पड़ोस में मिठाइयाँ बाँटी जा रही थीं। जन्म के छः दिन बाद होने वाले समारोह की तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं। किसी को फोन किया जा रहा था, किसी के पास महरी के ज़रिये बुलावा भेजा जा रहा था। पूरा का पूरा परिवार ही मानो कोई कसर रह ना जाए इस बात के लिए सजग और चौकस था । समारोह वाले दिन घर को बड़े सलीके से सजाया गया था। ताजे फूलों की ख़ुशबू फ़िज़ा में फैली हुई थी । पकवानों की ख़ुशबू हवा में घुली हुई थी—जैसे हर दीवार, हर कोना उस नन्ही-सी जान का स्वागत कर रहा हो।
पता लगा कर किन्नरों का एक समूह भी आ पहुँचा था। बच्चे को गोद में लेकर वे उसकी बलैयाँ लेते हुए मंगल गीत गा रहे थे।
ये किन्नर भी ना अपना दुख भूलकर दूसरों की ख़ुशी में अपनी ख़ुशियाँ ढूँढ लेते हैं। उनके गीतों में जीवन का दर्द भी रहता है और आशीर्वाद की सच्चाई भी। उस दिन घर सचमुच पूरा लग रहा था।
जब से डॉक्टर ने सुमित को बताया था कि आप पिता बनने वाले हैं, उसकी ख़ुशियों का ठिकाना न रहा। दिन-रात दोनों आने वाले बच्चे के सपनों में खोए रहते थे—लड़का होगा तो यह करेंगे, लड़की होगी तो ऐसा करेंगे। नाम से लेकर स्कूल और करियर तक सब कुछ तय कर लिया गया था। उनके दिन आने वाले बच्चे के इर्द-गिर्द घूमने लगे थे।
क्या हमारे यहाँ आज भी बच्चों का भविष्य माता पिता ही तय करते हैं ?
सपना भी अपनी बहू का बहुत ख़याल रखती थी। “वो करो, ये मत करो”—से लेकर उसके खाने-पीने तक की पूरी ज़िम्मेदारी उसने अपने ऊपर ले ली थी। जैसे वह फिर से माँ बन रही हो।
बड़े प्यार से सभी ने उसका नाम परी रखा था। परियों जैसी थी भी वह। उसके घर में आते ही रौनक लौट आई थी। कल तक जो घर एकदम शांत रहता था, आज उसकी हँसी और रोने से गुलज़ार रहने लगा था। वह सबकी आँखों का तारा थी। क्या मजाल कि उसकी आँखों में आँसू टिक जाएँ—कोई न कोई हमेशा बाहें फैलाए खड़ा रहता था।
समय यूँ ही पंख लगाकर उड़ता चला गया। घर की दीवारों पर चित्रकारी करते हुए कब वह स्कूल पहुँची, कब कॉलेज—किसी को पता ही नहीं चला। लड़कियाँ वैसे भी कुछ जल्दी ही बड़ी हो जाती हैं।
परी का दाख़िला शहर से बाहर एक बड़े और अच्छे कॉलेज में हो गया। वह अपनी पढ़ाई और अपने सपनों में मग्न हो गई थी। खो सी गई थी वो नन्ही सी परी अपनी, अपने दोस्त और अपने भविष्य की दुनिया में । छुट्टियों में ही एकाध दिन के लिए घर आना होता था । वो भी क्या आना और क्या जाना। मेहमान ही कह सकते हैं ।
इधर सुमित और आर्या की ज़िंदगी धीरे-धीरे फिर से पहले जैसी होने लगी थी—एकाकी। बच्चे ख़ासकर लड़कियां घर की रौनक होती हैं। इस बात का अहसास उनके घर से जाने के बाद होता है ।
सुमित और आर्या की ज़िंदगी- सुबह दफ़्तर की तैयारी, दिनभर काम, और शाम को घर लौटकर वही सन्नाटा। जल्दी खाना, और फिर अपने-अपने लैपटॉप और मोबाइल में सिमटी हुई दुनिया। कभी-कभी दोनों एक-दूसरे को देखते, पर कहने को जैसे कुछ बचा ही नहीं था।
ज़िंदगी भी अजीब है—वह चलती रहती है, बिना रुके। हम इंसान ही हैं जो रास्ते में कहीं-कहीं ठहर कर उसे नाम दे देते हैं—बचपन, जिम्मेदारी, ख़ुशी, अकेलापन। समय के साथ उसके मायने बदलते रहते हैं, और हम उन्हें समझते-समझते फिर किसी नए मोड़ पर पहुँच जाते हैं।

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