मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
सभी को यह सौभाग्य कहाँ मिलता है कि वे नववर्ष किसी क्लब, होटल या रिसोर्ट में अपनों के साथ मिल-जुलकर मना सकें। ऐसे मौके कुछ गिने-चुने लोगों के हिस्से ही आते हैं। एक अलग ही

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अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
तबका है ऐसे लोगों का ।बाक़ी लोगों के लिए तो पूरा शहर ही उत्सव स्थल बन जाता है—शहर की सड़कें, पार्क, चिड़ियाघर और खुले मैदान, जहाँ वे अपने परिजनों के साथ नववर्ष का स्वागत करने पहुँचते हैं।
होटलों के बंद कमरों से दूर, खुले आसमान के नीचे, ठंड का आनंद लेते हुए लोग नववर्ष का स्वागत करते हैं। उस दिन ठंड भी मानो अपनी चुभन को कम कर देता है । ऐसे अवसरों पर धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्रवाद जैसी तमाम दीवारें मानो अपने-आप ढह जाती हैं। जहाँ तक नज़र जाती है, लोगों का एक विशाल हुजूम—एक सैलाब—दिखाई देता है, जो खुशियों से सराबोर होकर नववर्ष मना रहा होता है।
इस बार नववर्ष पर एक बात और देखने को मिली। लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते समय ‘अंग्रेज़ी नववर्ष’ या ‘आंग्ल नववर्ष’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर रहे थे। ऐसा क्यों—यह मेरी समझ से परे है। खैर, शब्द ही तो हैं; जिसे जैसे ठीक लगे, वैसे अपने मन मुताबिक़ इस्तेमाल करे, किसने रोका है।
नववर्ष के दिन दफ़्तर बंद नहीं होते। साल की शुरुआत में छुट्टी लेना भी मुनासिब नहीं होता। लेकिन नववर्ष पर सड़कों पर निकलकर शहर का एक चक्कर लगाना तो बनता ही है। सुबह से यही उधेड़बुन दिमाग़ में चल रही थी—दफ़्तर का काम भी था और मन सड़कों पर भटकने को बेचैन। दिल तो अब भी बच्चा ही है; बस ज़िम्मेदारियों ने उसे बाँध रखा है, वरना बंधन तोड़ते देर ही कहाँ लगती है।
वैसे आम तौर पर देखा गया है कि नववर्ष का दिन दफ़्तर में भी एक-दूसरे से मिलने-जुलने और शुभकामनाएँ देने में ही निकल जाता है, फिर भी दफ़्तर जाना तो पड़ता ही है। ऐसे में एक ही रास्ता बचता है—समय चुराने का। और समय चुराना भी कोई नई बात नहीं। कहते हैं, चुराने वाले तो आँखों का काजल तक चुरा लेते हैं और किसी को भनक भी नहीं लगती। मधुमक्खियाँ फूलों पर बैठकर पूरा शहद चुरा लेती हैं और बेचारे फूलों को पता तक नहीं चलता।
मुझे कृशन चंदर की किताब फुटपाथ के फ़रिश्ते याद आ गई। उसमें एक जगह लिखा है कि हर व्यक्ति की अपने समाज में एक इज़्ज़त होती है। यहाँ तक कि एक जेबकतरा भी अपने समाज में इस बात के लिए सम्मान पाता है कि उसने कितनी सफ़ाई से किसी की जेब काट ली और उसे पता भी नहीं चला। शायद महीप सिंह की कहानी भूलते भागते क्षण में भी बचपन में चोरी-छिपे मटर की फलियाँ खाने के आनंद का ज़िक्र आता है। खैर, बात भटक रही है।
तो हमने भी समय चुराया। गाड़ी निकाली और नववर्ष का आनंद लेने सड़कों पर निकल पड़े। उम्मीद नहीं थी कि इतनी भीड़ होगी। जगह-जगह पुलिस ने बैरियर लगा रखे थे। सड़कें नववर्ष के उत्सव में डूबे लोगों से पटी पड़ी थीं। जिधर और जहाँ तक नज़र जाती, लोगों का हुजूम ही हुजूम दिखाई देता—तमाम वर्जनाओं से मुक्त, अपने-अपने अंदाज़ में नववर्ष मनाते हुए लोग।
हमारे साथ एक मित्र भी थे। बड़ी मुश्किल से गाड़ी को भीड़ से निकालकर एक लंबी ड्राइव की। रास्ते में एक अच्छी-सी जगह रुककर गर्मागर्म चाय पी और फिर वापस दफ़्तर लौट आए—नववर्ष की थोड़ी-सी चुराई हुई ख़ुशी के साथ।
