रविवारीय- बिजनौर की घटना, जब माँ ने बेटे की विकृत चाहत के खिलाफ उठाया कठोर कदम

अविश्वश्नीय किन्तु सत्य 

आजकल आए दिन अख़बार की सुर्खियों में पति- पत्नी के रिश्तों को कलंकित करने वाली घटनाएँ रहती हैं । पति पत्नी का जो

मनीश वर्मा, लेखक और विचारक

रिश्ता परस्पर प्रेम और विश्वास पर क़ायम था, उसमें इतनी गिरावट आ जाएगी ; कभी-कभी तो यक़ीन नहीं होता, पर सच्चाई को आप झूठला नहीं सकते हैं ।
कुछ वैसी ही एक छटना अभी हाल फ़िलहाल में ही घटी है । काश अगले दिन अख़बार के पन्ने पर यह ख़बर आती कि यह ख़बर झूठी थी । गलती से छप गई थी। काश ! अख़बार वाले इस ख़बर को छापते ही नहीं । पर क्या करें किसी ना किसी को तो हरिशचंद्र बनना ही पड़ता है और अपने किरदार को बख़ूबी निभाना भी पड़ता है । यह घटना दिल को झकझोर देने वाली है।उत्तर प्रदेश के बिजनौर शहर की यह ख़बर पढ़कर दिल जैसे एक पल को धक्क सा कर गया। एक माँ… जन्म दायिनी माँ जिसने अपने ही बेटे का गला रेत दिया, सिर पर दरांती से वार कर उसकी जान ले ली। उस बेटे की ज़िंदगी उसने अपने हाथों से ख़त्म कर दी । जिसे उसने नौ महीने अपने कोख में रख जन्म दिया था ।कारण— सुन कर आप सन्न रह जाएँगे ।पुलिस के मुताबिक, बेटा नशे में धुत होकर अपनी ही माँ के साथ अनैतिक संबंध बनाने का प्रयास कर रहा था, और इससे पहले भी वह ऐसा कर चुका था। माँ ने पुलिस से साफ कहा—उसे इस हत्या का कोई मलाल नहीं है, क्योंकि यह हत्या नहीं, वध था; एक रिश्ते का सम्मान, एक माँ की अस्मिता की रक्षा के लिए उठाया गया कदम।
अगर यह ख़बर अख़बार में न छपी होती और किसी ने हमें सुनाई होती, तो शायद हमारी पहली प्रतिक्रिया होती—“अविश्वसनीय! ऐसा भी हो सकता है क्या?” लेकिन सच हमारे सामने था—स्याही से लिखी पंक्तियों में, हमारे ही समय का, हमारे ही समाज का हिस्सा बनकर।
हमारे संस्कारों में माँ-बेटे का रिश्ता पवित्रतम माना गया है। यह संबंध ममता, सुरक्षा और निःस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है। जब यह रिश्ता कलंकित हो जाता है, तो वह केवल एक घर की दीवारों को नहीं, बल्कि पूरे समाज के नैतिक ढांचे को हिला देता है। हम रिश्तों को इसलिए बनाते हैं ताकि उनमें शुचिता बनी रहे, उनमें मर्यादा और गरिमा सुरक्षित रहे। लेकिन जब वही रिश्ते दुराचार और वासनाओं की आग में भस्म होने लगते हैं, तो सवाल केवल एक परिवार का नहीं रह जाता—यह पूरे सामाजिक ताने-बाने पर उठता है।
हमने कॉलेज में पढ़ा था ओडिपस कॉम्प्लेक्स—सिग्मंड फ़्रॉयड का वह सिद्धांत, जिसमें कहा गया कि एक बालक के अवचेतन में अपनी माँ के प्रति आकर्षण और पिता के प्रति प्रतिस्पर्धा की भावना जन्म ले सकती है। यह नाम यूनानी मिथक से आया, जहाँ ओडिपस अनजाने में अपने पिता की हत्या कर अपनी माँ से विवाह कर लेता है। बाद में जब उसे सच पता चलता है, तो वह आत्मग्लानि से पीड़ित हो जाता है , किंतु वह कहानी साहित्य और मनोविज्ञान के दायरे में थी—एक काल्पनिक संदर्भ, जिसे पढ़ते समय हम वास्तविक जीवन से बहुत दूर मानते थे।
लेकिन बिजनौर की यह घटना—यह किसी पुस्तक का पन्ना नहीं, बल्कि हमारे समय का वह कड़वा सच है जिसे हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। समाज भले ही तकनीकी और आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहा हो, लेकिन मानसिकता का विकास रुक-सा गया है। हम अभी भी रिश्तों को स्त्री-पुरुष की सीमित परिभाषाओं में घेरकर देख रहे हैं, और जब यह सीमाएँ टूटती हैं, तो परिणाम विनाशकारी हो जाते हैं।
यह केवल एक अपराध की कहानी नहीं है—यह एक चेतावनी है कि रिश्तों की मर्यादा और सम्मान के लिए समाज को सतर्क रहना होगा। क्योंकि जब ममता की गोद में ही वासना के साये उतर आते हैं, तो वह क्षण केवल एक घर के लिए नहीं, पूरी मानवता के लिए शोक का क्षण बन जाता है।

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘

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