2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल के तौर पर देखे जाने वाले गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव के नतीजे राष्ट्र की राजनीतिक दिशा तय करेंगे. बताएंगे कि राष्ट्र की पॉलिटिक्स किस करवट बैठेगी. बीजेपी का विजय रथ चलता रहेगा या फिर विपक्ष महागबंधन करके इस रथ को रोकने में सफल होगा. गोरखपुर संसदीय सीट 29 वर्ष बाद गोरक्षपीठ से अलग हुई है. 1989 में महंत अवेद्यनाथ सांसद बनें, फिर 1998 में सीट महंत योगी आदित्यनाथ के पास आ गई. CM बनने के बाद योगी को सांसदी छोड़नी पड़ी. ऐसे में बीजेपी ने क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र दत्त शुक्ला को चुनाव मैदान में उतार दिया. भाजपा की रणनीति ध्वस्त करने व उसके परंपरागत वोट बैंक में सेंधमारी के लिहाज से ही सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दांव खेला . पहले निद पार्टी के नेता प्रवीण निषाद को सपा में शामिल कराया, फिर प्रत्याशी बना दिया . इसके बाद बसपा, रालोद, निषाद पार्टी, पीस पार्टी व वामपंथी पार्टियों से हाथ मिलाकर उपचुनाव के मैदान में कूद पड़े हैं . सपा की मंशा है कि बीजेपी से परंपरागत सीट छीनकर देश, संसार में संदेश दिया जाए . बताया जाए कि मोदी-योगी-अमित शाह की तिकड़ी साझेदारी के आगे नहीं टिक पाएगी . ऐसा हुआ तो आगामी लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की आसार बढ़ जाएगी . इस उपचुनाव में साझेदारी से दूरी बनाने वाली कांग्रेस पार्टी और अन्य राजनीतिक दल भी जुड़ेंगे .
यूपी उपचुनाव के नतीजे तय करेंगे राष्ट्र की राजनीतिक दिशा
