रविवारीय- जिंदाबाद और मुर्दाबाद के शोर के बीच हड़ताल

प्रशासन हाय हाय। हाय हाय हाय हाय। प्रशासन मुर्दाबाद, मुर्दाबाद मुर्दाबाद। …….. ( प्रशासनिक मुखिया का नाम लेकर ) मुर्दाबाद। कार्यालय के मुख्य द्वार पर कर्मचारी संघ के नेताओं का जमावड़ा लगा हुआ था। वो किसी को भी, चाहे वो कर्मचारी हों या फिर अधिकारी अंदर आने की अनुमति नहीं दे रहे थे। कुछ लोगों ने अंदर आने की कोशिश की, पर पहले तो उन्हें संघ की एकता का पाठ

मनीश वर्मा,लेखक और विचारक

पढ़ाया गया। जब वो नहीं माने तो उन्हें जबरिया अंदर आने से रोक दिया गया। अधिकारियों से तो ख़ैर कम से कम आज़ तो उनका छत्तीस का आंकड़ा था, ख़ासकर एडमिन वालों के साथ। जिंदाबाद मुर्दाबाद के बीच थोड़े बहुत अपशब्दों का इस्तेमाल तो होता ही है। इससे कहां तक बचा जा सकता है।
वैसे तो संघ एक कड़ी की तरह प्रशासन और कर्मचारियों के बीच काम करता है। सरकार की अनुमति से ही संघ बनाए जाते हैं, पर कहीं ना कहीं एक पतली सी रेखा है जो जब टूटती है तो उसकी परिणति थोड़ी भयावह होती है।
खैर! जिंदाबाद और मुर्दाबाद का शोर जारी था। आज़ ऐसा लगता है मानो प्रशासन ने भी सोच लिया था। कान में उन्होंने रूई की गोलियां डाल लिया था। छोड़ दो इन्हें। जितना चाहे शक्ति प्रदर्शन कर लें।
धीरे धीरे लोग बेसब्र हो रहे थे। कार्यालय बंद होने का समय आ गया था, पर प्रशासन की तरफ से अभी तक किसी तरह की कोई भी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी। संघ के नेतागण अपनी ओर से भरपूर कोशिश कर रहे थे कि कर्मचारियों के बीच उत्साह बना रहे, वो उर्जावान रहें, पर भौतिक शास्त्र का एक महत्वपूर्ण नियम है जब तक विस्थापन ना हो, आप जितना भी जोर आजमाइश कर लें काम का होना नहीं माना जाता है। बस यहां भी यह बात चरितार्थ हो रही थी। दोनों ही तरफ से एक दूसरे की शक्ति का आंकलन शायद किया जा रहा था। दोनों ही एक दूसरे की शक्ति एवं क्षमता को डाइल्यूट करने की पुरज़ोर कोशिश में लगे हुए थे।
ख़ैर! ठंडी बयार की तरह अचानक से प्रशासन ने उन्हें आमंत्रित किया कि आप अपने मांगों के साथ आएं। मिल बैठकर एवं स्थापित नियमों के आलोक में कर्मचारियों के हित में फैसला लेने की कोशिश करते हैं।
कर्मचारियों के प्रतिनिधियों को तो बस इसी बात का इंतजार था। अब मुर्दाबाद की जगह जिंदाबाद का शोर सुनाई देने लगा था। अचानक से बड़े ही हौले से माहौल ने करवट बदला था।
अंदर प्रशासन और कर्मचारियों के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता चल रही थी और बाहर अपने अपने हिसाब से अंदर के माहौल का सभी आंकलन करने में लगे हुए थे ।
अंदर प्रशासनिक मुखिया ने अचानक से कर्मचारियों के प्रमुख से कहा आपने मुझे लगभग दस मांगों की सूची दी है। चलिए आप मुझे गारंटी दें कि अब आप इस तरह से अपना रोष प्रदर्शन नहीं करेंगे। अपनी भाषा को संयमित रखेंगे और कर्मचारियों की क्षमता का उपयोग संस्थान के हित में करेंगे। मैं आपकी सारी बातें मान लेता हूं। अब आप कहें आपको जो कहना है।
प्रशासनिक मुखिया ने उनकी सारी मांगे मान ली। अब तो उनके सामने कुछ बचा ही नहीं। ऐसा लगा मानो अचानक से उन्हें सांप सुन गया हो। उनके अस्तित्व पर एक प्रश्न चिन्ह लग रहा था। अचानक से कर्मचारियों के नेता ने प्रशासनिक मुखिया से कहा सर दो-तीन मांगों को आप फिलहाल छोड़ दें। उन्हें मानने की फिलहाल कोई जरूरत नहीं है। आप अगर हमारी सारी मांगों को मान लेंगे तो यह हमारे संगठन पर एक सवालिया निशान छोड़ जाएगा। आखिर हम हैं किसलिए। हमारा अस्तित्व तभी तक है जबतक हम कर्मचारियों को आपके खिलाफ कर अपना काम करते हैं तो सर कृपया कुछ मांगों को छोड़ दें ताकि हम बाहर निकल अपने लोगों को बता सकें कि हमलोगों ने अपनी ताक़त से, संगठन और कर्मचारियों की एकता की वजह से अपनी बातें मनवाई है। बाकी मांगों के लिए हमारी लड़ाई जारी रहेगी और आने वाले समय में हम कुछ और मांगो को लेकर अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।
और इस तरह से सुबह से जारी धरना प्रदर्शन , एक दूसरे के खिलाफ ज़ोर आजमाइश, नारेबाजी समाप्त होती है।
डिस्क्लेमर:- कृपया इसे व्यक्तिगत तौर पर ना लें। इस लेख का किसी भी घटना या व्यक्ति से किसी भी तरह का कोई लेना-देना नहीं है।
✒️मनीश वर्मा’मनु’

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