रविवासरीय- चलिए नजाकत के शहर के करीब के दूधवा नेशनल पार्क

‘ आप मुस्कुराएं कि आप लखनऊ में हैं ‘। चलिए, लखनऊ को अपने आप पर इतना नाज़ तो है कि वो किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट ला सकता है। तहज़ीब और नज़ाकत का शहर है जो है। ऐसा कहा जाता है कि नज़ाकत से लबरेज़ इस शहर में रसगुल्ले

,मनीष वर्मा,लेखक और विचारक

भी छील कर खाए जाते हैं। तहज़ीब तो बस्स पहले आप पहले आप । और इसके आगे क्या कहें हम। ‘ नवाबों का शहर ‘ नाम से वैश्विक पहचान। अपने इसी पहचान को लेकर आगे बढ़ता हुआ शहर। उत्तर प्रदेश की राजधानी , पर अब पहले जैसी बात कहां रही। शहर काफी विस्तार ले चुका है। गोमती नदी के इस तरफ़ और उस तरफ़ में काफी फर्क दिखाई देता है। एक तरफ़ खालीस लखनऊ तो एक तरफ़ अपने आप में प्रवासियों को समेटता हुआ शहर । गोमती नगर से शुरू हुआ प्रवासियों का यह हिस्सा अब काफी आगे बढ़ चुका है और लखनऊ की एक नई पहचान बन चुका है। अब मुस्कुराहटों , तहज़ीब और नज़ाकत से थोड़ा आगे निकल हम आपको लिए चलते हैं , घुमक्कड़ी के लिए।
अचानक से कार्यालय में बैठे बैठे हमने प्लान किया कि सप्ताहांत में कहीं निकला जाए। मौसम भी अब थोड़ा मेहरबान हो चला था। अब देर किस बात की। निकल पड़े हम दोस्तों के साथ घूमने के लिए ‘ दुधवा नेशनल पार्क’। बाघों के लिए जाना जाता है दुधवा नेशनल पार्क। अन्य जानवर भी है यहां, पर मुख्यत: यह नेशनल पार्क बाघों के लिए मशहूर है। शाम , कार्यालय में हम लोगों ने प्लान किया और सहमति बनी कि क्यों नहीं रात में ही निकल चला जाए।

बस, हम सभी निकल पड़े ‘ दुधवा नेशनल पार्क ‘ की ओर। लखनऊ से करीब – करीब सवा दो सौ किलोमीटर के आसपास की दूरी पर स्थित है दूधवा नेशनल पार्क।
लखनऊ से निकल सबसे पहले हम सीतापुर पहुंचते हैं। सीतापुर पहुंचते -पहुंचते रात के ग्यारह बज चुके थे। हम लोगों ने वहां खाना खाया और तय किया कि रात्रि विश्राम हम लखीमपुर खीरी में करेंगे। लखीमपुर खीरी पहुंचते हुए हमें लगभग एक बज चुके थे। रात्रि विश्राम के बाद सुबह – सुबह नाश्ते के उपरांत हमारी सवारी अब दुधवा नेशनल पार्क की और निकलने को तैयार थी। यहां से दूधवा की दूरी लगभग अस्सी किलोमीटर है। बिल्कुल नेपाल की सीमा से लगता हुआ क्षेत्र। तराई का इलाका। नेशनल पार्क से नेपाल की सीमा ‘ गौरी फंटा ‘ करीब पच्चीस किलोमीटर की दूरी पर है।

‘ दुधवा नेशनल पार्क ‘ जीप सफारी की बुकिंग ऑनलाइन होती है और जब हम लोगों ने ऑनलाइन देखना शुरु किया तो समझ ही नहीं आया कि इतने वेवसाईट में से ऑफिशियल वेबसाइट कौन सी है। खैर, ऑफिशियल वेबसाइट का पता चला और जब हम वहां पहुंचे तो मालूम पड़ा कि जीप सफारी के लिए उस दिन कोई जगह ख़ाली नहीं है। जैसा कि हमने पहले ही बताया कि बस हमें कहीं चलना था सप्ताहांत में तो चल पड़े। पहले से कुछ प्लान किया ही नहीं। सोचा रास्ते में चीजें आती जाएंगी और हम उसे अपने हिसाब से निपटाते चलेंगे। चलिए अब हम लोगों ने जुगाड़ तकनीक का सहारा लिया। अब हम ऑफिशियल वेबसाइट से हट कर गुगल पर मौजूद अन्य वेबसाइट पर संभावनाएं तलाश करने लगे। बड़ा ही सुखद आश्चर्य हमें तब हुआ जब हमें जीप सफारी की बुकिंग और वह भी ऑनलाइन मिल गई।ऑफिशियल वेबसाइट पर बुकिंग ना रहने के बावजूद भी तथाकथित प्राइवेट ऑपरेटर्स सफारी की अवस्था कर देते है और वह भी आधिकारिक। हमारी अब जीप सफारी की बुकिंग हो गई। हम सभी अब बड़े उत्साहित थे । तीन घंटे की सफारी , जंगल के बीच में तीन घंटे प्रकृति और मित्रों के साथ बिताना। हम सभी सोचकर ही रोमांचित हो रहे थे। शुरुआत में कुछ छोटे – मोटे जानवर मिलते चले गए, पर हमारा तो ध्यान लगा हुआ था कब महाराज के दर्शन हों। हमे ऐसा लग रहा था कि अभी अचानक से महाराज सामने आएंगे और पोज़ देते हुए कहेंगे भाई जितना फोटो निकालना है निकाल लो , मैं आ गया हूं। पर, ऐसा कहीं होता है भला। यह एक महज़ संयोग होता है कि महाराज से आपका आमना सामना हो, उनके दर्शन हों जाएं। घूमते हुए कभी आपके सामने आ जाएं। भाई उनकी भी अपनी जिंदगी है। अपने मिज़ाज हैं। क्यों आपकी मर्ज़ी के अनुसार चलें वो।
हमें सफारी के दौरान प्रवासी पक्षियों से मुलाकात हुई। तस्वीरें खिंचें हमने उनके। पानी में तैरते और अठखेलियां करते हुए उदबिलावों को भी हमने अपने अपने कैमरे में कैद किया, पर आंखें तो हमारी महाराज को ही ढूंढ रही थी। हमारे लिए तो क्या वहां आए सभी लोग बड़ी आतुरता से और शिद्दत से महाराज का इंतजार कर रहे थे। तीन घंटे की सफारी अब खत्म होने को थी। अब भी हम आशान्वित थे, पर हमें निराशा ही हाथ लगी। साहब ने मन बना लिया था। सप्ताहांत के आराम में कोई खलल नहीं। महाराज के दर्शन तो हमें नहीं हुए झुंड में घूमते हुए जंगली सुअरों से हमारा वास्ता पड़ा। कुछ वन मूरगी और मूरगे दिखाई दिए। जितने भी लोगों ने जीप सफारी की बुकिंग की थी सभी के निराशा का आलम था। महाराज के दर्शन किसी को भी नहीं हुए। हम सभी सप्ताहांत में वहां गए थे। महाराज ने भी अपना सप्ताहांत मनाया। घर से निकले ही नहीं

हां एक बात ज़रूर हुई हम सभी प्रकृति के बीच जहां किसी भी तरह के प्रदूषण का नामों निशान नहीं होता है हमने तीन घंटे गुणवत्ता पूर्ण जीवन के बिताए। जब आप ऐसी जगह पर होते हैं तो दिल चाहता है वक्त थोड़ा ठहर जाए। पर, ऐसा कहां होता है भला वक्त का पहिया तो अनवरत चलता ही रहता है । बस ग़ालिब दिल को बहलाने के लिए यह ख़्याल अच्छा है बाकि तो सब प्रारब्ध है। सृष्टि अपने तरीके से गतिमान है।
चलिए ‘ मनु कहिन ‘ के अगले अपिसोड में फिर मिलेंगे। आपसे कुछ और बातें करेंगे।

✒️ मनीश वर्मा ‘मनु

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