इंसान में इंसानियत……. फ़ुर्सत के पल में पढ़ें ✍🏻

Posted on April 11, 2020 By कार्यालय संवाददाता

बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह की कलम से
सवाल ज़हर का नहीं था वो तो पी गया।तकलीफ़ लोगों को तब हुई जब ज़हर पी के भी जी गया।केवल वही व्यक्ति बुद्धिमान होता है जो अपने पाँव को मज़बूती से रखने के बाद ही दूसरा पाँव बढ़ाता है।किसी नई परिस्थिति को अच्छी तरह से समझे बिना वर्तमान स्थिति का त्याग नहीं करना चाहिए।जो व्यक्ति अपने प्रयासों के माध्यम से सफलता पाने की इच्छा रखता है और जीवन में कोई महान लक्ष्य पाना चाहता है तो उसे हमेशा अच्छे लोगों के साथ मेल मिलाप रखना चाहिए । व्यक्ति की जड़ों को खोखला करने वाले रिश्तेदार से बेहतर वह शत्रु है जो खुलेआम शत्रुता प्रगट करता है ।सच्चा मित्र वह होता है जो अपने मित्र के हित के लिए काम करता हो।इंसान का संस्कार और जीवन में किया हूवा अच्छा और बुरा कार्य उनके जीवन रूपी किताब का एक अनमोल पन्ना होता है। जब भी इंसान उस पीछे के पन्ने को देखता है तो हर बार इंसानियत जागृत होती है।ज़िंदगी की यात्रा में जीवन रूपी किताब के पन्ने वक़्त के साथ वर्तमान के पल में ख़ुशी और डर पैदा करते हुवे पल को स्मरण करा देते है।इस जीवन की डोर में, सांसों के ताने बाने हैं।दुख की थोड़ी सी सलवट है तो सुख के फूल कुछ सुहाने हैं।आज का नज़ारा देख भयभीत दुनिया के इंसान ज़रा सोचे आगे क्या होगा।भविष्य के क्या ठिकाना हैं।ऊपर बैठा वो बाजीगर इंसान के भाग्य में क्या है वही सिर्फ़ जनता है।दृढ़ संकल्प के साथ हम भी इंसान मन में ठाने है वर्तमान एकांत ही जीवन का सुंदर मार्ग है और एकांतवास ही जीवन का सुंदर कल है।इंसान आप चाहे जितना भी जतन करे दामन, घर भरने का झोली में वो ही आएँगा जो भाग्य में तेरे नाम के दाने है। दो ऐसी सत्य कथाऐं जिनको पढ़ने के बाद शायद आप भी अपनी ज़िंदगी जीने का अंदाज़ बदलना चाहें:-
पहली
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐक बार नेल्सन मांडेला अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए। सबने अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर किया और खाना आने का इंतजार करने लगे। उसी समय मांडेला की सीट के सामने वाली सीट पर एक व्यक्ति अपने खाने का इंतजार कर रहा था। मांडेला ने अपने सुरक्षा कर्मी से कहा कि उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो।खाना आने के बाद सभी खाने लगे, वो आदमी भी अपना खाना खाने लगा,पर उसके हाथ खाते हुए कांप रहे थे।खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर रेस्तरां से बाहर निकल गया।उस आदमी के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था, खाते वख़्त उसके हाथ लगातार कांप रहे थे और वह ख़ुद भी कांप रहा था।मांडेला ने कहा नहीं ऐसा नहीं है।वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे कैद रखा गया था।जब कभी मुझे यातनाएं दी जाती थीं और मै कराहते हुए पानी मांगता था तो ये मेरे ऊपर पेशाब करता था।मांडेला ने कहा मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ शायद वैसा ही व्यवहार करूंगा। पर मेरा चरित्र ऐसा नहीं है। मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है।वहीं धैर्य और सहिष्णुता, क्षमा की मानसिकता हमें विकास की ओर ले जाती है ।
दूसरी
मुंबई से बैंगलुरू जा रही ट्रेन में सफ़र के दौरान टीसी ने सीट के नीचे छिपी लगभग तेरह/चौदह साल की एक लड़की से कहा “ टिकट कहाँ है?” काँपती हुई लडकी बोली नहीं है साहब। टीसी बोला तुम गाड़ी से उतरो ।इसका टिकट मैं दे रही हूँ। पीछे से ऐक सह यात्री ऊषा भट्टाचार्य की आवाज आई जो पेशे से प्रोफेसर थी ।ऊषा जी पूछती है – तुम्हें कहाँ जाना है ? लड़की बोलती है पता नहीं मैम। तब ऊषा जी बोली – “तब मेरे साथ चलो, बैंगलोर तक । ऊषा जी लड़की का नाम पूछती है तो वो “चित्रा” बताती है।बैंगलुरू पहुँच कर ऊषाजी ने चित्रा को अपनी जान पहचान की एक स्वंयसेवी संस्था को सौंप कर अच्छे स्कूल में भी एडमीशन करवा दिया। जल्द ही ऊषा जी का ट्रांसफर दिल्ली हो गया जिसके कारण चित्रा से संपर्क टूट गया। कभी-कभार केवल फोन पर बात हो जाया करती थी। करीब बीस साल बाद ऊषाजी को एक लेक्चर के लिए सेन फ्रांसिस्को (अमरीका) बुलाया गया ।लेक्चर के बाद जब वह होटल का बिल देने रिसेप्सन पर गईं तो पता चला पीछे खड़े एक खूबसूरत दंपत्ति ने बिल चुका दिया था। उषा जी पूछा “तुमने मेरा बिल क्यों भरा?”, वो बोली मैम यह मुम्बई से बैंगलुरू तक के रेल टिकट के सामने कुछ भी नहीं है।तब उषाजी बोली अरे तुम चित्रा हो।
चित्रा और कोई नहीं बल्कि इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरमैन सुधा मुर्ति थीं जो इंफोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति की पत्नी हैं।कभी कभी आपके द्वारा की गई किसी की सहायता, किसी का जीवन बदल सकती है।कुदरत का कहर भी जरूरी था । वरना हर कोई खुद को ईश्वर समझ रहा था।जो कहते थे कि मरने तक की फुरसत नहीं है, वे आज मरने के डर से घर में बैठे हैं।मशरूफ थे सारे अपनी जिंदगी की उलझनों में , वक़्त नही था अपनो के लिए।जरा सी जमीन क्या खिसकी कि सबको ईश्वर याद आ गया।ऐसा भी आएगा वक्त किसी को पता नहीं था।यदि जीवन में कुछ कमाना है बिना स्वार्थ जरूरतमंदों को सहायता प्रदान किजिए।हौंसला और घोंसला मत छोड़िए बाकी सब ठीक है ठीक ही रहेगा।घर में रहें सुरक्षित रहें।अंत में एक पंक्ति सबके लिए ज़रा इस पर आज के एकांतवास में ईमानदारी से सोचना, चिंतन करना :- बीते कल का अफसोस और आने वाले कल की चिन्ता, ज़िंदगी में दो ऐसे चोर हैं..जो हमारे आज की खूबसूरती को चुरा ले जाते हैं।

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