पति के अपमान से आहत होकर जहां यज्ञ कुंड में कूद पड़ी थी सती

Posted on February 15, 2020 By बिहार पत्रिका डेस्क

अनादि काल से शक्ति उपासना की पुण्य भूमि बिहार के तीन शक्ति पीठों (गया सर्वमंगला, छिन्न मस्तिका, हजारीबाग, झारखंड तथा अम्बिका भवानी आमी दिघवारा सारण) में मूर्धन्य आमी वाली अम्बिका भवानी के सच्चे दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता।

चाहे दक्षिणमार्गी वैष्णवी शक्ति साधक हो या वाममार्गी कपालिनी के साधक। बहरहाल साधकों को सिद्धियां एवं श्रद्धालुओं की मुरादें पूरी करती हैं सर्वेश्वरी। चाहे शरद नवरात्र हो, बासंतिक नवरात्र हो या फिर चैत्र नवरात्र श्रद्धालुओं की भीड़ देखी जा सकती है।

सारण जनपद का यह शक्ति पीठ जिला मुख्यालय छपरा एवं सोनपुर के मध्य में स्थित है। उत्तर में हरिहर नाथ और पश्चिम में बाबा धर्मनाथ छपरा चतुष्कोण में समान दूरी पर स्थित है तो त्रिभुजास्थिति में समान दूरी पर पशुपतिनाथ, काठमांडू,नेपाल, रावणेश्वर महादेव बैद्यनाथ धाम,विश्वेश्वर महादेव वाराणसी उप्र स्थित है। शिव शक्ति से संरक्षित एवं समन्वित अम्बिका भवानी आमी स्थल वैष्णव शक्ति एवं अवधूत कपालिक साधकों की साधना भूमि है।

प्रखंड मुख्यालय दिघवारा से 6 किमी पश्चिम, अम्बिका भवानी हाल्ट से 1 किमी दक्षिण एनएच 19 से सटे गंगा तट पर ऊंचे टीले पर स्थित भवानी मंदिर सारण गजेटियर के अनुसार दक्ष प्रजापति यज्ञ स्थल के रूप में मान्य है।
प्रयाग के कल्याण मंदिर द्वारा प्रकाशित बिहार में शक्ति साधना नामक पुस्तक के द्वितीय खंड में आये वर्णन के अनुसार बिहार की भूमि में शक्ति उपासना वैदिक काल से ही नहीं, अनादि और आदि काल से होती आ रही है। इस पावन भूमि में तीन शक्ति स्थान मूर्धन्य हैं।

इनका पौराणिक आधार है ये है अम्बिका भवानी, सर्वमंगल गया एवं छिन्न मस्तिकाहजारीबाग, यद्यपि विद्वत जनों में मार्कण्डेय पुराण में वर्णित सुरथ समाधि की तपोभूमि एवं दक्ष प्रजापति की यज्ञ भूमि को लेकर मतभेद है।

किन्तु श्रद्धालु एवं साधक भेद बुद्धि से ऊपर उठ अभेद एवं अघोर बनकर साधनारत रहते हैं। विशेषकर, शरद एवं चैत्र नवरात्र के अवसर पर। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित सुरथ और समाधि वैश्य कथा को त्रिदण्डी स्वामी उनके शिष्य एवं गजेन्द्र मोक्ष धाम के पीठाधीश्वर स्वामी लक्ष्मणाचार्य, शिववचन सिंह शिवम प्रभृति विद्वान अम्बिका स्थान को प्रमाणित करते हुए स्वीकार करते हैं कि पूरे विश्व में मिट्टी की प्रतिमा यदि कहीं है तो वह आमी में। मेषध ऋषि का आश्रम भी गंगा सोन व घाघरा के संगम चिरांद में प्रमाणित है। यह वहीं स्थल है जहां राजा सुरथ और वैश्य समाधि को वैष्णवी शक्ति का साक्षाकार हुआ।

मंदिर में अंकित अम्बे, अम्बिके अम्बालिके शब्द भी महालक्ष्मी के पर्याय है। उत्खनन से प्राप्त शंख, और उसपर अंकित चित्र आदि शक्ति वैष्णवी की अदृश्य उपस्थिति दर्शाते हैं।
सारण गजेटियर एवं बिहार सरकार के पूर्व पुरातत्वनिदेशक डा. प्रकाश चरण प्रसाद इसे दक्ष क्षेत्र एवं शिव शक्ति समन्वय स्थल मानते हैं।

डा. प्रसाद इसे प्राचीन मातृ शक्ति रूप मानते हुए मां की मिट्टी की प्रतिमा की प्रागैतिहासिक काल की प्रतिमा स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार ऐसी प्रतिमाओं के लिए प्राण प्रतिष्ठा आवश्यक नहीं है। शिव एवं शक्ति क्षेत्र प्रमाणित करते हुए पुरातत्ववेता का कहना है कि यहां गंगा शिव रूप में लिंगाकार है। गंडक व सोन का संगम रहा आमी लिंगाकार शिव एवं अंडाकार शक्ति रूप में है।

नौ दुर्गा की नौ पिण्डियों के साथ एकादश रूद्र यहां स्थापित हैं। यह संगम निर्णय भूमि है, जो साधना और सिद्धि के लिए उपयुक्त है। डा. देवेन्द्र नाथ शर्मा, महा पंडित राहुल सांकृत्यायन, डा. राजेश्वर सिंह राजेश, भू-वैज्ञानिक प्रो. विपिन प्रसाद उक्त पावन स्थल का सांस्कृतिक विकास कुषाण काल से स्वीकारते हैं।

भू-वैज्ञानिक एवं एसडीडी कालेज रामपुर के भूगोल विभागाध्यक्ष प्रो. विपिन प्रसाद के अनुसार सिद्धपीठ अम्बिका स्थल गंगा, सोन एवं नारायणी का संगम था। भौगोलिक परिवर्तन स्वरूप दो नदियों की धारा बदल गयी।

बहरहाल शिव शक्ति स्थल बनाम सुरथ समाधि स्थल विवाद का हल श्रद्धालुगणों में नहीं है। जानकारों मानना है कि सुरथ समाधि एवं दक्ष प्रजापति स्थल आमी ही है। यदि दक्ष क्षेत्र कनखल (उतराखंड) प्रमाणिक है तो औधेश्वर भगवान रूद्र देव के 108 मतुण्डमाल प्रमाणित करते है कि त्रेता के पूर्व सतयुग में सती दहन यही हुआ था।

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