सरकारी स्वास्थ संस्थाओं से उठता विश्वास

Posted on January 6, 2020 By बिहार पत्रिका ब्यूरो

जहां एक ओर भारत विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर है, वही जेकेलोन एवं गोरखपुर जैसी घटनाएं यह साबित करती है कि महज यह एक सपना है। हाल ही में जिस तरीके से कोटा के जेकेलोन हॉस्पिटल में महज एक महीने के अंदर 100 से अधिक नवजात शिशुओ की मौत हो जाती है। यह कोई छोटी बात नहीं है। गोरखपुर हॉस्पिटल की घटनाएं अभी तक याद है। इन घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि हमारी सरकारी स्वास्थ संस्थाएं एवं उसमें जाने वाले गरीब परिवारो का जीवन दोनों ईश्वर के भरोसे हैं। यदि यह सच है तो ऐसे सरकारी स्वास्थ संस्थाओं को बंद करना ही उचित होगा।

मीडिया रिपोर्ट में आई खबरो के माध्यम से कोटा के जेकेलोन हॉस्पिटल मे नवजात शिशुओं कि मरने का कारण एनीमिया एवं शिशु का कम वजन बताया जा रहा है। इसके अलावे हॉस्पिटल में जो भी उपकरण मौजूद थे वह भी ठीक तरीके से काम नहीं कर रहे थे। तो इसका मतलब साफ है कि ऐसी घटनाएं होती रहेंगी और हमारी सरकारी मशीनरी चुपचाप देखती रहेंगी। क्योंकि सभी राज्यों के सरकारी हॉस्पिटल का अमूमन यही हाल है। आयुष्मान भारत एवं जन औषधि केंद्र जैसे सरकारी​ योजनाओं पर इतने बड़े बजट खर्च करने की क्या जरूरत है। यह पैसे हमारे 121 करोड़ भारतीय के मेहनत की कमाई है। यह पैसे यदि हमारे भारतीयों के स्वास्थ्य की रक्षा नहीं कर सकते, तो महज उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
आज भी कुपोषण जैसी समस्याएं भारत के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद भारत विश्व में अग्रणी है। आयुष्मान भारत योजना, जननी शिशु सुरक्षा योजना, पोषाहार मिशन ये मात्र योजनाएं बनकर रह गई है। प्रतिवर्ष कुपोषण से लाखों बच्चो एवं माता की मौत हो रही है। सरकारी अस्पतालों की हाल भी खस्ता नजर आता है। एक तो इन अस्पतालों में दवाइयों की उपलब्धता नहीं रहती है,जिसके कारण गरीब लोगों को बाहर के दवाइयों पर निर्भर रहना पड़ता है। ये बाहरी दवाइयां इतनी महंगी होती है कि गरीब परिवारो के आर्थिक पहुंच से बाहर होती है। केंद्र सरकार ने नई स्वास्थ नीति में घोषणा की है कि कोई भी सरकारी डॉक्टर मरीजों को बाहर की दवाइयां ना लिखे। लेकिन हमेशा मरीजों को बाहर की दवाइयों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
प्राथमिक स्वास्थ केंद्र का हाल बहुत बुरा है। जहां पर दिन के 12:00 बजे के बाद कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता। रात में तो आप भूल कर भी उन सरकारी हॉस्पिटल का दरवाजा ना बजाएं। उससे बेहतर है कि आप प्राइवेट में तुरंत मरीज को लेकर चले जाए। आज जितने भी प्राथमिक स्वास्थ केंद्रों​ के सरकारी डॉक्टर हैं , सभी के अपने प्राइवेट क्लिनिक चल रहे हैं। तो इससे साफ है कि गरीबों का इलाज भगवान भरोसे है। जहां एक तरफ हमारी संविधान के निदेशक तत्व में बताया गया है कि राज्य सभी लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराएं। जो राज्यों के लिए स्लोगन मात्र बनकर रह गया है। बस हम उन राजनैतिक, प्रशासनिक महकमें का इंतजार कर सकते हैं कि कब तक वह नींद में सोए रहते हैं और ऐसे ही मसूम बच्चों की जिंदगीयो के साथ खेलते रहेंगे और हम लोग देखते रहेंगे। क्योंकि हम गरीब है, लाचार है।

ज्ञान रंजन मिश्रा की रिपोर्ट

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