अत्याधुनिक तकनीक से कम समय में हो रहा नई दवाओं का विकास

औरंगाबाद। फार्मास्युटिकल और बायोमेडिकल विज्ञान के क्षेत्र में तेजी से हो रहे नवाचार ने वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जीन एडिटिंग, डिजिटल हेल्थ और बायोटेक्नोलॉजी के बढ़ते उपयोग से दवा निर्माण, रोग निदान और उपचार की प्रक्रिया में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है। अब दवा खोज की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक तेज, सटीक और किफायती हो गई है। एआई और मशीन लर्निंग तकनीक के माध्यम से नई दवाओं का विकास कम समय में संभव हो रहा है जिससे गंभीर बीमारियों के इलाज में तेजी आई है। इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्मार्ट लैब के उपयोग से अनुसंधान कार्य भी अधिक प्रभावी हो गया है।

यह बातें मुख्य अतिथि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, दिल्ली के वैज्ञानिक ‘जी’ एवं एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. राजेश अरोड़ा ने कही। वे यहां बियाडा परिसर स्थित महादेवा लाल सर्राफ कॉलेज ऑफ फार्मेसी में आज से आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन “फार्मा स्पेक्ट्रम-2026” को संबोधित कर रहे थे। इस सम्मेलन में “फार्मास्युटिकल और बायोमेडिकल विज्ञान में नवाचार और भविष्य के रुझान” विषय पर चर्चा की गई।
कॉलेज ऑफ फार्मेसी के निदेशक डॉ. ब्रजकिशोर सिंह ने कहा कि बायोमेडिकल क्षेत्र में पर्सनलाइज्ड मेडिसिन का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इस पद्धति में प्रत्येक व्यक्ति के जीन, जीवनशैली और स्वास्थ्य डेटा के आधार पर अलग-अलग उपचार तैयार किए जा रहे हैं। जीन एडिटिंग तकनीकों के जरिए कैंसर और दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों के इलाज में नई संभावनाएं खुली हैं। नई तकनीकों में इन-सिलिको ट्रायल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जिसमें आधुनिक तरीके से दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है। इससे न केवल समय और लागत में कमी आ रही है बल्कि पारंपरिक परीक्षण प्रक्रियाओं पर निर्भरता भी घट रही है।

कॉलेज की चेयरपर्सन सरिता सिंह ने कहा कि भारत के संदर्भ में देखा जाए तो यह क्षेत्र देश के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आया है। मजबूत वैज्ञानिक आधार, सस्ती दवा उत्पादन क्षमता और तेजी से बढ़ते तकनीकी निवेश के कारण भारत वैश्विक बायोमेडिकल नवाचार का केंद्र बन सकता है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर इन चुनौतियों का समाधान करें, तो आने वाले वर्षों में फार्मास्युटिकल और बायोमेडिकल विज्ञान न केवल स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और प्रभावी बनाएंगे, बल्कि मानव जीवन की गुणवत्ता में भी व्यापक सुधार लाएंगे।
कार्यक्रम प्रभारी डॉ. विकास कुमार सिंह ने कहा कि ‘फार्मास्युटिकल और बायोमेडिकल विज्ञान में नवाचार और भविष्य के रुझान’ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्देश्य शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, उद्योग पेशेवरों और छात्रों को नैनो तकनीक, अनुकूलित दवाओं के डिजाइन के लिए क्वांटम कंप्यूटिंग, वास्तविक दुनिया के साक्ष्य-आधारित डेटा-संचालित दवा विकास, विकेन्द्रीकृत नैदानिक ​​परीक्षण और फार्मास्युटिकल विज्ञान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में हुई नवीनतम प्रगति का पता लगाने के लिए एक साथ लाना है।

इस सम्मेलन में भारत के अलावा अन्य देशों के भी वक्ता शामिल हुए। इनमें बुरफा विश्वविद्यालय, सेन्सूक, थाईलैंड की डॉ. तनिकन सांगनिम, डॉ. कमपनार्ट हुआनबुट्टा, पोखरा विश्वविद्यालय, नेपाल के डॉ. गुलाम मोहम्मद खान, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया के प्रो. (डॉ.) विवेक डेव, राष्ट्रीय फोरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय, गांधीनगर परिसर, गुजरात के डॉ. राकेश यादव, तंजानिया के डॉ. रिचर्ड चेरेहानी काशिंड्ये, भारत के डॉ. दीपक कुमार, डॉ. परमिता पॉल (दुआ) शामिल रहे। इसके अतिरिक्त अमेरिका से मलाईका नामदास, मलेशिया से डॉ. ओमोटायो फतोकुन तथा नाइजीरिया से प्रो. (डॉ.) अजायी अयोडेजी फोलोरुन्शो ने फार्मा और बायोमेडिकल विज्ञान में नवाचार तथा भविष्य पर अपने विचार रखे।
मौके पर वाराणसी के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. ओ. पी. तिवारी, विभागाध्यक्ष कौसर शफात आदि मौजूद रहे।

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