(अनुभव की बात, अनुभव के साथ)
सर्वप्रथम ” बिहार पत्रिका ” के समस्त पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। नया वर्ष आपको ढेर सारी खुशियां दे, सफलता दे, आपकी सारी मनोकामना पूरी करें।
पिछले कई दिनों से मैं इस इंतजार में था कि कोई नव वर्ष के शुभकामना संदेश का कार्ड मुझे दे जाए। दो-चार दिनों से जब कभी भी डाकिया पर नजर पड़ती तो लगता कि वह हमारे घर की ओर ही आ रहा है। शायद कहीं से किसी ने बधाई संदेश का कार्ड भेजा होगा। परंतु अफसोस………..। आधुनिकता के इस दौर में अब वह बात कहाँ रह गई। जमाना स्मार्टफोन का है।जमाना व्हाट्सएप, फेसबुक और ईमेल का है। कोई एक मैसेज टाइप करना है और सबों को सेंड कर देना है।
नव वर्ष के इस अवसर पर अपना वह बचपन याद आ रहा है,वह किशोरावस्था याद आ रही है। वो दिन भी क्या दिन हुआ करते थे।नव वर्ष आने के एक माह पूर्व से ही ग्रीटिंग कार्ड के दुकानों पर हमारा वह बार-बार घूमना याद आ रहा है। याद आता है,कि किस तरह कभी दोस्तों के साथ तो कभी दोस्तों से छिपकर कार्ड की दुकानों पर मनपसंद कार्ड खरीदने के लिए चक्कर लगाया करते थे।कार्ड खरीदना,उसमें कुछ प्यारे-प्यारे संदेश लिखना और फिर उसे पोस्टऑफिस जाकर भेजना। कभी किसी को हाथों-हाथ देना तो कभी चुपके से किसी के बैग में रख देना।किसी से कार्ड पाकर या डाकिया द्वारा कार्ड मिलने पर जो खुशी मिलती थी,उन बधाई संदेशों में जो फिलिंग्स होती थी, वो स्मार्टफोन के संदेशों में कहाँ।ना तो कोई बधाई संदेश के कार्ड देता है, न खुद किसी को भेजता हूं। सच, स्मार्टफोन ने भावनाओं को खत्म कर दिया है।आधुनिकता ने हमें जितनी सुविधा दी है, उतना ही हमें भावना शून्य बना दिया है।कुछ सामान्य संदेश होते हैं, जो आमतौर पर एक से दूसरे स्मार्टफोन में घूमते रहते हैं। इन संदेशों को भेजकर या पाकर वो खुशी महसूस नहीं होती, जो कार्ड्स में होती थी। स्मार्टफोन के संदेशों में किसी की भावनाओं का कुछ पता नहीं चलता। बस शिष्टाचार का आभास होता है। कार्ड के संदेशों में भेजने वाले की भावना का पता चलता था। हाथ से लिखे दो लाइनों में प्यार झलकता था, अपनापन महसूस होता था।
खैर,समय के साथ बदलाव भी आवश्यक है।ऐसा नहीं होता तो फिर हम उन दिनों को कैसे याद करते। बदलाव आवश्यक है।बदलाव प्रमाण है कि हम जीवित हैं। स्थिरता तो मृत्यु के समान है।जीवन में निरंतर बदलाव आवश्यक है।
नया वर्ष कई मायनों में महत्वपूर्ण है। देश बड़े राजनीतिक बदलाव से गुजर रहा है। लोकसभा का चुनाव सर पर है। क्या नए वर्ष में हम संकल्प लेंगे कि हम अपने निजी लाभ से पहले राष्ट्र हित का ख्याल रखेंगे ? धर्म और जाति के नाम पर हम बेवकूफ नहीं बनेंगे,उन्माद नहीं फैलाएंगे ? हमें संकल्प लेना होगा,अब हम राजनीतिक दलों के झांसे में नहीं आएंगे। सबसे पहले राष्ट्र,सबसे पहले हिंदुस्तान की अस्मिता और अखंडता का ख्याल रखेंगे।
एक बार फिर आप सबों को नववर्ष की शुभकामनाऐं।
