मईया कहती है मेरी, हमारे ननिहाल में बहुत बड़ा विश्वकर्मा पूजा का आयोजन हो रहा था ‘जब मैंने जन्म लिया’

Posted on September 17, 2019 By पारस नाथ

चदा ठाकुर,
(सोशल वर्कर)

और आज मैं बाईस की हो गयी…
बाईस साल पहले, औऱ बाईस साल बाद!
कितना बदल गया न संसार?

मईया कहती है मेरी, हमारे ननिहाल में बहुत बड़ा विश्वकर्मा पूजा का आयोजन हो रहा था ‘जब मैंने जन्म लिया’

शंखो, पंडितो के मंत्र, बड़े से मंडप, छतों पर लगे चारों तरफ अपने पहले जमाने का भोंपू।
और मेरा इस संसार में एंट्री!
इश्श….
कभी कभी सोचते है क्या फिल्मी तरीके से आयी होऊँगी मैं इस दुनिया में।
फिर कुछ चीज़े सुनकर मन मायूस हो जाया करता था, ‘सबकी अपनी मन्नतें’ बंद दरवाज़े पर टकटकी लगाएं लोगों की उस भगवान से बस एक ही गुजारिश थी ‘इस बार बेटा हो जाये’
मैं दूसरी संतान के रूप में फिर ‘स्त्रीलिंग’ का टैग लेकर आ गयी।
मेरी मासूमियत देख भी हर एक चेहरे पर मनहूसियत आना लाज़मी था।
‘क्योंकि दूसरी बिटिया थी मैं’
ख़ैर…. समय के साथ चीज़े परिवर्तित होती गयी और साथ में मैं बड़ी!

कुछ लोग बस ये कहकर निकल जाते है ‘आई कैंट अंडरस्टैंड यू’ और कुछ बस ‘मेरा बिना कुछ कहे ही हमें समझ जाता है’
दुनिया तो गोल है ही; लोग अपने अतीत, भविष्य और वर्तमान में भी गोल-गोल घूमते रहते है।
किसी का अतीत उसका पीछा नही छोड़ता तो कोई भविष्य को संवारने वास्ते अपने वर्तमान का दहिवाड़ा बना रहा होता है।
शायद अतीत का चोंचला लिए खुलकर ना जीने वाले लोगो मे से मैं भी थी।
लगता था इस दुनिया में कोई है ही नही जो हमको मानता हो, बाबूजी मईया, नानी, मासी कोई नही।

बालपन और बालमन क्या सोचता और क्या करता है वो खुद नही जानता।
बस यही कहानी थी ‘समय के साथ चीज़े परिवर्तित हुई’ और आज सब नॉर्मल लग रहा। क्योंकि शायद मुझे ये लगने लगा कि ‘मैं नॉर्मल हूँ’ चीज़ों को एब्नॉर्मल तरीक़े से देखना ही शायद हमें कभी कभी एब्नॉर्मल बना जाता है….

दुनिया बदलने से याद आया ‘अब बेटियों को गर्भ में मारने का सिलसिला बहुत कम गया है’
चीज़े बदल गयी है….अब हम बस लूटे जाते है, हमारे चीथड़े कर दिए जाते है..
कभी चचेरे भाई, चाचा, फूफा आदि की हवस हमें निगलना चाहती है तो कभी बहादुर गैंग उठाकर हमें ले जाया करता है।
तो कभी मोहब्बत समझ हम उन बेड़ियों को लांघ जाते है जिसके आगे बस काँटे होते है..जिसे हमें अकेले ही पार करना होता है!

बाईस साल की हो गयी मैं! पता नही कैसे इतनी जल्दी!
लग रहा कल ही तो हमने अपनी अठारहवीं जन्मदिवस मनाया था पूरे धूमधाम से! अपने पसंद की लहंगा चुन्नी भी पहना था।
उफ़्फ़ ये भागती घड़ी की सुईयाँ….
अब कुछ सालों में इस शहर को छोड़ किसी दूजे की शहर में जा बसूं, कौन जानता है?
बाईस की जो हो चुकी ‘बोझ बनना तो लाज़मी है, बोझ न होते हुए भी’
क्योंकि बाईस की जो हो चुकी…
हमें सौगात में मिला करता है ‘दो साल, एक साल, तीन साल पांच साल:)’

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